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Tuesday, December 25, 2012

चलती बस में सामूहिक बलात्कार: शर्मसार हुई राजधानी

चलती बस में सामूहिक बलात्कार: शर्मसार हुई राजधानी

देश की राजधानी महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं। चलती बस में हुए बलात्कार ने इसकी एक बार और पुष्टि कर दी है। इस वहशी वारदात ने यह गवाही ज़रूर पेश की है कि महिलाओं को शिकार बनानेवाले भेड़िये किस हद तक बेख़ौफ़ हो चुके हैं। 
जहां पुलिस थाने महिलाओं के लिए असुरक्षित बने हुए हों, वहां सार्वजनिक स्थानों पर उनकी हिफ़ाज़त का बंदोबस्त कैसे मुमकिन हो सकता है? 
इसके लिए सोनी सोरी का उदाहरण काफी है। फ़िलहाल, वह रायपुर जेल में बंद है। उस पर माओवादियों के लिए काम करने का आरोप है। सच उगलवाने के लिए उस पर बेतरह ज़ुल्म ढाया गया। थाने में नंगा कर करेंट के झटके दिये गये और यौनि में पत्थर ठूंसे गये। अंकित गर्ग नाम के जिस पुलिस अधिकारी ने यह वहशियाना काम किया, उसे गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति के हाथों बहादुरी का इनाम मिला। कुछ बुनियादी सवालों को रेखांकित करती आदियोग की यह रिपोर्ट; 


यह घिनौना कारनामा दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार की नाक के नीचे हुआ। ज़ाहिर है कि लोगों का ग़ुस्सा दोनों सरकारों के ख़िलाफ़ है। यह भी ज़ाहिर है कि लोकसभा चुनाव की तेज़ होती सरगर्मियों के बीच यह मामला विपक्षी दलों के लिए कांग्रेस पर हमला बोलने का हथियार बनेगा। लेकिन तभी तक, जब तक कोई दूसरा मामला उनके हाथ में नहीं आ जाता और तब वोट के सियासी मैदान में यह मामला बहुत पीछे छूट जायेगा। 
लेकिन मानव अधिकारों, लोकतांत्रिक अधिकारों और ख़ास कर महिला आंदोलनों के बीच इसकी गर्माहट लंबे तक रहेगी। जिस तरह इस ताज़ा मामले को लेकर नयी दिल्ली समेत देश की दूसरी जगहों पर भी लोग सड़कों पर उतरे और चौतरफ़ा केंद्र सरकार की थूथू हुई, उससे लगता है कि ऐसी वारदातों की रोकथाम किये जाने के कारगर उपायों की तलाश किये जाने के लिए व्यापक दबाव की शुरूआत होगी। आनन-फ़ानन हुई गुनाहगारों की गिरफ़्तारी यही संकेत देते हैं वरना तो होता यही है कि ऐसे मामले कुछ दिन आक्रोश का विषय बनते हैं और सोडा वाटरी जोश की तरह ठंडे पड़ जाते हैं। इसलिए भी गुनाह पर लगाम नहीं कस पाती।

याद कीजिए गुवाहटी में कुछ दिन पहले हुई घटना को जिसमें शाम ढले एक स्कूली छात्रा के साथ एक भीड़ ने नोचा-खसोटी की थी जैसे वह इनसान नहीं, कोई बेबस जानवर हो जिसे कहीं भी ज़बह किया जा सकता है। किसी ख़बरिया टीवी चैनल ने उस हादसे की बाक़ायदा रिकार्डिंग भी की थी जिसके लिए ‘मर्दानगी’ दर्शाने का यह सिलसिला कैमरामैन के आने तक जारी रखा गया था। उस हादसे के चश्मदीद गवाह बने संबंधित पत्रकार ने इस तरह अपने पेशे के प्रति ईमानदारी दिखायी। उसके लिए वह मामला स्पेशल कवरेज बन गया। उसने ज़िम्मेदार नागरिक की नहीं, पेशेवर पत्रकार की भूमिका अदा की- ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर। यह इक्कीसवीं सदी में पत्रकारिता के बदलते उसूलों और तक़ाज़ों की बानगी है। क्या पता कि कल को बलात्कार या हत्या का लाइव टेलीकास्ट भी दिखा दिया जाये और इस जिगरे के लिए टीवी पत्रकार को हाथोंहाथ उठा लिया जाये। मीडिया के कारपोरेटीकरण से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है जिसके लिए हर ख़बर केवल बिकाऊ माल है?

वापस ताज़ा बलात्कार कांड पर लौटें। इसका कुल क़िस्सा यह है कि पैरा मेडिकल की छात्रा अपने इंजीनियर दोस्त के साथ बस का इंतज़ार कर रही थी। एक स्कूली बस उनके सामने रूकी। उन्हें बताया गया कि बस उसी ओर जा रही है जिधर उनका गंतव्य है। दोनों को क्या पता था कि यह लिफ़्ट लेना उनके लिए बहुत मंहगा पड़ेगा और जो उन्हें ज़िंदगी भर सालता रहेगा। बस आगे बढ़ी तो उसमें सवार शोहदों ने इस बात को लेकर छींटाकशी शुरू कर दी कि वह अपने ‘यार’ के साथ निकली है। दोस्त ने इसका विरोध किया तो दोनों की पिटाई शुरू हो गयी। इसी के साथ ज़ुबानी छेड़खानी शारीरिक छेड़खानी में तब्दील हो गयी, पीड़िता के शरीर के साथ खेलने लगी। इसका अंत सामूहिक बलात्कार से हुआ। यह दोस्त के साथ बाहर निकलने की ख़ूंख़्वार सज़ा थी। बाद में दोनों को अधनंगा सड़क पर फेंक दिया गया।

ज़ाहिर है कि युवक को कम चोटें आयीं लेकिन पीड़िता अधमरी हो गयी। इस क़दर कि उसे चार बार सर्जरी से गुज़रना पड़ा। यह पंक्ति लिखे जाने तक उसकी हालत बेहद नाज़ुक बनी हुई है। भले ही वह बेहोशी से बाहर आ गयी लेकिन बोल पाने में असमर्थ है। डाक्टरों के मुताबिक़ उन्होंने ऐसे मामलों में वहशियत के इतने गहरे सबूत अब तक नहीं देखे। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उसके साथ किस हद तक दरिंदगी का सुलूक़ हुआ होगा। दुआ कीजिए कि उसकी सेहत जल्द सुधरे। लेकिन सवाल है कि उसकी आत्मा पर हुए हमले से वह कैसे उबरेगी? वह तो ताउम्र उसका पीछा करेगा, उसे सोते-जागते सतायेगा।

दिल्ली सरकार की मुखिया महिला है। इस मामले के सिलसिले में उनकी नसीहत है कि महिलाएं रात में निकलने से परहेज़ करें, अकेले निकलने की ग़लती न करें। मतलब कि अपने घर या हास्टल तक सिमटी रहें और इस तरह मर्द की काया में घूम रहे छुट्टा सांड़ों से बचें। यह कल्याणकारी सरकार का हाल है जिसकी कमान एक महिला के हाथ में है। वैसे, मत भूलें कि उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री कुमारी मायावती के कार्यकाल में महिला विरोधी हिंसा का रिकार्ड टूटा था। वह दलित महिला हैं और उनके शासन में बलात्कार की शिकार सबसे ज़्यादा दलित महिलाएं बनीं। यह सबूत है कि राजकाज में किसी महिला के आ जाने भर से तय नहीं हो जाता कि महिलाएं मज़बूत हो जायेंगी, कि मर्दवाद का निशाना बनने से बच जायेंगी। सोचने की बात है कि मर्दवादी रूझानों और रवायतों का दबदबा जब राजनीति में बाक़ायदा राज करता है तो आख़िर घर, समाज और ज़िंदगी के दूसरे क्षेत्र उससे कैसे अछूते रह सकते हैं? संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण का मुद्दा इस क़दर तंग गलियों में उलझा कि अभी तक सुलझ नहीं सका। इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है?

चलती बस में हुए सामूहिक बलात्कार के बाद मांग उठ रही है कि ऐसे मामलों के निपटारे के लिए त्वरित फ़ैसला लेनेवाली अदालतें बनायी जायें और उनकी मियाद तय हो। बेशक़, बलात्कार जैसे महिला अपराधों पर इससे अंकुश लगेगा। एक आवाज़ यह भी यह है कि महिला हिंसा रोकने के लिए सख़्त क़ानून बनाये जायें। लेकिन महिला हिंसा समेत तमाम अपराधों के लिए कई क़ानून हैं लेकिन होता यह है कि क़ानूनी दांवपेंचों की भूलभुलय्या में इंसाफ़ हांफ़ने लगता है और अपराधी बच निकलते हैं। यों ही नहीं कहा जाता कि अगर रूपया ख़र्च करने की क़ुव्वत है तो क़ानून को भी नचाया जा सकता है। अगर सियासत साथ में हो तो यह काम और भी आसान हो जाता है। कितने ही राजनेताओं पर महिलाओं के शारीरिक शोषण का आरोप है लेकिन वे संसद और विधानसभाओं की शोभा बढ़ा रहे हैं।

याद कीजिये कि नारायण दत्त तिवारी बतौर राज्यपाल सेक्स सीडी कांड में फंसे। पितृत्व परीक्षण की फ़जीहत से भी गुज़रे और अब सपा प्रमुख उनका दामन थामने को उतावले हैं। यह सियासत से नैतिकता के ग़ायब होते जाने की दास्तान है। यह भी याद कीजिये कि अपने सियासी रसूख़ के चलते कुछ साल पहले उत्तर प्रदेश के राजनेता अमरमणि त्रिपाठी ने और अभी पिछले साल राज्स्थान के राजनेता महिपाल मदरेणा ने क़ानून को कितना छकाया। ख़ैर, दोनों की पोलपट्टी आख़िरकार खुली और दोनों जेल में हैं। अमरमणि मधुमिता हत्याकांड में उम्र क़ैद के सज़ायाफ़्ता हैं जबकि महिपाल भंवरी देवी हत्याकांड के मुजरिम हैं। दोनों ने अपनी ‘प्रेमिकाओं’ की महत्वाकांक्षाओं को उभार कर उनका शोषण किया और जब इज़्ज़त दांव पर लगने के आसार दिखे तो उन्हें रास्ते से ही हटा दिया। लेकिन कितने राजनेता क़ानून की गिरफ़्त में फंसे? ज़्यादातर मामले तो ठोस सबूतों की ग़ैर मौजूदगी में हमेशा के लिए बंद हो गये।

यक़ीनन, त्वरित फ़ैसला लेनेवाली अदालतें थोड़ा-बहुत कारगर हो सकती हैं। थोड़ा-बहुत इसलिए कि यह क़ानूनी उपाय होगा, राजनैतिक और सामाजिक नहीं। ताज़ा मामले में यह मांग दोबारा उठी है कि बलात्कारियों के लिए फांसी की सज़ा तय हो ताकि कोई अपराधी यह अपराध करने से पहले हज़ार बार सोचे। एक हिस्से ने तो उन्हें सरेआम फांसी दिये जाने की मांग की। संसद के दोनों सदनों में भी यह मांग उठी। लेकिन थोड़ा ठंडे दिमाग़ से सोचने की ज़रूरत है कि क्या यह अदालती बर्बरता नहीं होगी? क्या यह सभ्यता और आधुनिकता की निशानी होगी? जीवन छीनने का अधिकार किसी को नहीं, भले ही गुनाहगार ने इंसानियत को कितना ही शर्मसार क्यों न किया हो। जघन्य अपराधियों को मौत नहीं, कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए और वह भी जल्दी से जल्दी। लेकिन यह भी महिला हिंसा से मुक्ति का अचूक नुस्खा नहीं हो सकता।

सवाल ज़हनियत बदले जाने का है। लेकिन यहां तो बालीवुड से हालीवुड फ़िल्मों तक में हिंसा और सेक्स की भरमार है। बलात्कार के दृश्य तो चटखारा भरने के लिए हैं, दर्शकों को सन्न कर देने के लिए नहीं। टीवी के मनोरंजन चैनल तो ख़ैर न जाने कौन सी दुनिया रचने में मशगूल हैं जहां औरतें पुरातनपंथ से लिपटी और मर्दों की चेरी नज़र आती हैं जिनका अपना कोई स्वतंत्र वजूद नहीं। हमारे शिक्षण संस्थान भी आम तौर पर लड़कियों को सहनशीलता का पाठ पढ़ाने में मशगूल रहते हैं। जातीय पंचायतों ने तो जैसे महिलाओं के दिल-दिमाग़ को नियंत्रित करने का ठेका ले रखा है। वहां प्रेम की सज़ा मौत है और बलात्कार का मुआवज़ा पीड़िता से बलात्कारी का ब्याह लेकिन उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की हिमाक़त भला कौन करे? वोट की राजनीति इतनी कुत्ती चीज़ जो होती है। जहां पुलिस थाने महिलाओं के लिए असुरक्षित बने हुए हों, वहां सार्वजनिक स्थानों पर उनकी हिफ़ाज़त का बंदोबस्त कैसे मुमकिन हो सकता है?

इसके लिए सोनी सोरी का उदाहरण काफी है। फ़िलहाल, वह रायपुर जेल में बंद है। उस पर माओवादियों के लिए काम करने का आरोप है। सच उगलवाने के लिए उस पर बेतरह ज़ुल्म ढाया गया। थाने में नंगा कर करेंट के झटके दिये गये और यौनि में पत्थर ठूंसे गये। अंकित गर्ग नाम के जिस पुलिस अधिकारी ने यह वहशियाना काम किया, उसे गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति के हाथों बहादुरी का इनाम मिला।

विकास छत्तीसगढ़ सरकार का प्रमुख एजेंडा है। इसके लिए बहुत कुछ क़ुर्बान किया जा सकता है-जल, जंगल, ज़मीन, आजीविका और संस्कृति। सड़क दुर्घटनाओं पर मुख्यमंत्री का विचार है कि मंहगी बाइक और मोबाइल इसकी वजह है। साथ में अगर कोई ख़ूबसूरत दोस्त पीछे बैठी हो तो दुर्घटना का ख़तरा और बढ़ जाता है। विकास के मसीहा की सोच इतनी ओछी है। तो सवाल बहुतेरे हैं, चीख़ रहे हैं  और जवाब नदारद हैं। बेशक़, व्यापक जन आंदोलन ही महिलाओं के पक्ष में बेहतर माहौल बना सकता है जिसमें महिलाओं की आज़ादी और उनकी इज़्ज़त के बीच कोई उल्टा रिश्ता न हो, कि उन्हें बिना किसी ख़ौफ़ के आगे बढ़ने का मौक़ा मिले।

COURTESY: SANGHARSH SANVAD

Thursday, September 16, 2010

ਕਿਸਾਨ-ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਵਲੋਂ ਪੰਜਾਬ ਭਰ 'ਚ ਜ਼ਿਲਾ ਪੱਧਰੀ ਧਰਨੇ

Punjab struggles
Punjab peoples struggles against privatisation and liberalisation
Punjab peoples struggles against privatisation and liberalisation
Punjab peoples struggles against privatisation and liberalisation
Punjab peoples struggles against privatisation and liberalisation ਕਿਸਾਨ ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਵਲੋਂ ਕ੍ਰਮਵਾਰ ਸੰਗਰੂਰ, ਪਟਿਆਲਾ, ਮੋਗਾ, ਗੁਰਦਾਸਪੁਰ ਤੇ ਮੁਕਤਸਰ ਵਿਖੇ ਦਿੱਤੇ ਧਰਨਿਆਂ ਦੀਆਂ ਝਲਕਾਂ

ਪੰਜਾਬ ਭਰ ਦੀਆਂ 17 ਕਿਸਾਨ ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਵਲੋਂ ਲੜੇ ਜਾ ਰਹੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਦੀ ਲੜੀ ਤਹਿਤ, ਬਿਜਲੀ ਬੋਰਡ ਦੇ ਨਿੱਜੀਕਰਣ ਨਿਗਮੀਕਰਣ, ਖਿਲਾਫ਼, ਬਿਜਲੀ ਐਕਟ 2003, ਰੱਦ ਕਰਵਾਉਣ ਲਈ ਅਤੇ ਸੁਖਬੀਰ-ਕਾਲੀਆ ਕਮੇਟੀ ਦੀਆਂ ਲੋਕ ਵਿਰੋਧੀ ਸਿਫਾਰਸ਼ਾਂ ਰੱਦ ਕਰਾਉਣ ਤੇ ਹੋਰ ਮੰਗਾਂ ਨੂੰ ਲੈ ਕੇ ਸੰਘਰਸ਼ਸ਼ੀਲ ਕਿਸਾਨ-ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਪੰਜਾਬ ਭਰ ਵਿਚ ਜਿਲਾ ਪੱਧਰਾਂ 'ਤੇ ਡਿਪਟੀ ਕਮਿਸ਼ਨਰ ਦਫ਼ਤਰਾਂ ਮੂਹਰੇ ਵਿਸ਼ਾਲ ਧਰਨੇ ਲਗਾਏ ਗਏ ਅਤੇ ਰੋਸ ਮਾਰਚ ਕੀਤੇ ਗਏ। ਚੇਤੇ ਰਹੇ ਕਿ ਉਕਤ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਉਪਰੋਕਤ ਮੰਗਾਂ ਪੂਰੀਆਂ ਕਰਾਉਣ ਲਈ ਅਤੇ ਬਿੱਲ ਬਾਈਕਾਟ ਮੁਹਿੰਮ ਨੂੰ ਸਿਰੇ ਚਾੜਣ ਲਈ ਪੜਾਅਵਾਰ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਰ ਰਹੀਆਂ ਹਨ। ਉਕਤ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਨੱਗਰ ਪੰਚਾਇਤਾਂ, ਕਲੱਬਾਂ, ਧਾਰਮਕ-ਸੰਸਥਾਵਾਂ ਵੱਲੋਂ ਸਾਂਝੇ ਰੂਪ ਵਿਚ ਪਾਸ ਕੀਤੇ ਮਤੇ ਵੀ ਡਿਪਟੀ ਕਮਿਸ਼ਨਰਾਂ ਨੂੰ ਸੌਂਪੇ ਗਏ।


ਇਸ ਮੌਕੇ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਨੇ ਕਿਸਾਨ ਤੇ ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਨਤਾ ਨੂੰ ਸੰਦੇਸ਼ ਦਿੱਤਾ ਕਿ ਕੇਂਦਰ ਅਤੇ ਸੂਬਾਈ ਸਰਕਾਰਾਂ ਸਾਮਰਾਜ ਪੱਖੀ ਸੰਸਾਰੀਕਰਣ, ਨਿੱਜੀਕਰਣ, ਉਦਾਰੀਕਣ ਦੀਆਂ ਨੀਤੀਆਂ ਲਾਗੂ ਕਰਕੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਮਿਲਦੀਆਂ ਨਾ-ਮਾਤਰ ਸਹੂਲਤਾਂ ਨੂੰ ਖਤਮ ਕਰਕੇ ਜਨੱਤਕ ਅਦਾਰਿਆਂ ਦਾ ਨਿੱਜੀਕਰਣ ਕਰ ਰਹੀਆਂ ਹਨ ਜਿਸ ਕਾਰਣ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਮੁਸੀਬਤਾਂ ਹੰਢਾ ਰਹੇ ਲੋਕ ਹੋਰ ਭੁੱਖਮਰੀ, ਕੰਗਾਲੀ, ਬੇਰੋਜ਼ਗਾਰੀ, ਮਹਿੰਗਾਈ, ਅਨਪੜ੍ਹਤਾ ਦਾ ਸ਼ਿਕਾਰ ਹੋ ਜਾਣਗੇ ਅਤੇ ਸਿਹਤ ਸਹੂਲਤਾਂ ਅਤੇ ਪੀਣ ਵਾਲੇ ਯੋਗ ਪਾਣੀ ਤੋਂ ਵਾਂਝੇ ਹੋ ਜਾਣਗੇ, ਸਿੱਟੇ ਵਜੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਖੁਦਕੁਸ਼ੀਆਂ ਦੇ ਮਰਨਊ ਰਾਹ ਪੈ ਚੁੱਕੇ ਕਿਰਤੀਆਂ ਦੀ ਖੁਦਕੁਸ਼ੀ ਦਰ ਵਿਚ ਹੋਰ ਵਾਧਾ ਹੋ ਜਾਵੇਗਾ। ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਮੌਜੂਦਾ ਬਾਦਲ ਸਰਕਾਰ ਨਾ ਕੇਵਲ ਕੇਂਦਰ ਦੀਆਂ ਲੋਕ ਵਿਰੋਧੀ ਨੀਤੀਆਂ ਤੇ ਇੰਨ-ਬਿੰਨ ਅਮਲ ਕਰ ਰਹੀ ਹੈ ਬਲਕਿ ਪੇਂਡੂ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨਾਲ ਚੋਣਾਂ ਮੌਕੇ ਕੀਤੇ ਗਏ ਹਰੇਕ ਵਾਅਦੇ ਤੋਂ ਭੱਜ ਚੁੱਕੀ ਹੈ। ਵੱਧ ਰਹੀ ਮਹਿੰਗਾਈ ਕਿਸੇ ਥੁੜ੍ਹ ਦਾ ਸਿੱਟਾ ਨਹੀਂ ਬਲਕਿ ਵੱਡੇ ਕਾਰੋਬਾਰੀ ਘਰਾਣਿਆਂ, ਜਖੀਰੇਬਾਜਾਂ 'ਤੇ ਕਾਲਾਬਾਜ਼ਾਰੀ ਨੂੰ ਲਾਭ ਪੁਚਾਉਣ ਲਈ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਸਾਜਿਸ਼ ਦਾ ਸਿੱਟਾ ਹੈ ਜਿਸ ਵਿਰੁੱਧ ਜਮਹੂਰੀ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਲਗਾਤਾਰ ਸੰਘਰਸ਼ਸ਼ੀਲ ਰਹਿਣਗੀਆਂ। ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਇਕ ਪਾਸੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਸਮੇਤ ਸਮਾਜ ਦੇ ਸਾਰੇ ਹੱਕੀ ਘੋਲ ਲੜ ਰਹੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਕਾਲੇ ਕਾਨੂੰਨਾਂ ਨਾਲ ਦਬਾਉਣਾ ਚਾਹੁੰਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਦੂਜੇ ਪਾਸੇ ਪ੍ਰਚਾਰ ਸਾਧਨਾਂ ਦੀ ਦੁਰਵਰਤੋਂ ਲੋਕ-ਸੰਘਰਸ਼ਾਂ ਬਾਰੇ ਗਲਤ ਇਲਜ਼ਾਮ ਬਾਜੀ ਰਾਹੀਂ ਹੱਕੀ ਘੋਲਾਂ ਨੂੰ ਬਦਨਾਮ ਕਰਨਾ ਚਾਹੁੰਦੀ ਹੈ ਜਿਸ ਦਾ ਮੂੰਹ ਤੋੜ ਜਵਾਬ ਦਿੱਤਾ ਜਾਏਗਾ।


ਇਨ੍ਹਾਂ ਧਰਨਿਆਂ ਵਿਚ ਖੇਤ-ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦੀਆਂ ਮੰਗਾਂ ਵੀ ਪ੍ਰਭਾਵਸ਼ਾਲੀ ਢੰਗ ਨਾਲ ਉਭਾਰੀਆਂ ਗਈਆਂ ਜਿਵੇਂ ਕਿ - ਪੇਂਡੂ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਨੂੰ 10-10 ਮਰਲੇ ਦੇ ਰਿਹਾਇਸ਼ੀ ਪਲਾਟ, ਰੂੜੀਆਂ ਲਈ ਥਾਵਾਂ ਅਤੇ ਮਕਾਨ ਬਣਾਉਣ ਲਈ ਇਕ ਲੱਖ ਰੁਪੈ ਦੀ ਗ੍ਰਾਂਟ ਦਿੱਤੀ ਜਾਵੇ, ਨਰੇਗਾ 'ਚ ਹੁੰਦੀਆਂ ਘਪਲੇਬਾਜ਼ੀਆਂ ਬੰਦ ਕਰਕੇ ਢੁੱਕਵੀਆਂ ਉਜਰਤਾਂ ਸਹਿਤ ਹਰ ਬਾਲਗ ਜੀਅ ਨੂੰ ਪੂਰਾ ਸਾਲ ਕੰਮ ਦੀ ਗਰੰਟੀ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇ, ਕੰਮ ਨਾ ਦੇਣ ਦੀ ਸੂਰਤ ਵਿਚ ਗੁਜ਼ਾਰੇ ਜੋਗਾ ਬੇਕਾਰੀ ਭੱਤਾ ਦਿੱਤਾ ਜਾਵੇ, ਰੁਕੀਆਂ ਹੋਈਆਂ ਸਹੂਲਤਾਂ ਜਿਵੇਂ ਸ਼ਗਨ ਸਕੀਮ ਅਤੇ ਪੈਨਸ਼ਨਾਂ ਆਦਿ ਬਿਨਾਂ ਵਿਤਕਰੇ ਤੋਂ ਲਗਾਤਾਰ ਅਦਾ ਕੀਤੀਆਂ ਜਾਣ ਅਤੇ ਜਨੱਤਕ ਵੰਡ ਪ੍ਰਣਾਲੀ ਰਾਹੀਂ ਨਿੱਤ ਵਰਤੋਂ ਦੀਆਂ ਚੀਜ਼ਾਂ ਗਰੀਬ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਸਸਤੀਆਂ ਦਰਾਂ 'ਤੇ ਮੁਹੱਈਆ ਕੀਤੀਆਂ ਜਾਣ।

ਇਸ ਮੌਕੇ ਵੱਖ-ਵੱਖ ਥਾਵਾਂ 'ਤੇ ਹੋਏ ਇਕੱਠਾਂ ਨੇ ਹੱਥ ਖੜੇ ਕਰਕੇ ਐਲਾਨ ਕੀਤਾ ਕਿ ਮੋਟਰਾਂ 'ਤੇ ਮੀਟਰ ਨਹੀਂ ਲੱਗਣ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣਗੇ, ਬਿੱਲ ਭਰਣੋਂ ਅਸਮਰੱਥ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਮੀਟਰ ਪੱਟਣ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣਗੇ ਅਤੇ ਮੀਟਰ ਬਾਹਰ ਨਹੀਂ ਲੱਗਣ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣਗੇ, ਮੋਟਰਾਂ ਦੇ ਕੁਨੈਕਸ਼ਨ ਨਹੀਂ ਕੱਟਣ ਦਿੱਤੇ ਜਾਣਗੇ ਅਤੇ ਬਿੱਲ ਬਾਈਕਾਟ ਮੁਹਿੰਮ ਨੂੰ ਹੋਰ ਤੇਜ਼ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇਗਾ। ਈ.ਟੀ.ਟੀ. ਅਧਿਆਪਕਾਂ 'ਤੇ ਪਿਛਲੇ ਦਿਨੀਂ ਕੀਤੇ ਤਸ਼ੱਦਦ, ਗ੍ਰਿਫਤਾਰੀਆਂ ਅਤੇ ਸਰਕਾਰੀ ਕੂੜ ਪ੍ਰਚਾਰ ਦੀ ਨਿਖੇਧੀ ਕਰਦਿਆਂ ਇਹ ਮੰਗ ਵੀ ਕੀਤੀ ਗਈ ਕਿ ਸਰਕਾਰੀ ਮਹਿਕਮਿਆਂ 'ਚ ਖਾਲੀ ਪਈਆਂ ਪੋਸਟਾਂ ਭਰੀਆਂ ਜਾਣ ਅਤੇ ਨਿਯੁਕਤ ਕਰਮਚਾਰੀਆਂ ਨੂੰ ਢੁੱਕਵੀਆਂ ਤਨਖਾਹਾਂ ਦੀ ਅਦਾਇਗੀ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇ।

Friday, February 26, 2010

ਕਿਸਾਨ ਮਜ਼ਦੂਰ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਵਲੋਂ ਸੱਦਾ

ਕਿਸਾਨਾਂ-ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ ਦਾ ਵਿਸ਼ਾਲ ਏਕਾ-ਜ਼ਿੰਦਾਬਾਦ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੀ ਕਾਤਲ ਬਾਦਲ ਸਰਕਾਰ-ਮੁਰਦਾਬਾਦ
ਸ਼ਹੀਦ ਸਾਧੂ ਸਿੰਘ ਤਖਤੂਪੁਰਾ ਸ਼ਰਧਾਂਜਲੀ ਸਮਾਗਮ
28 ਫਰਵਰੀ ਨੂੰ ਪਿੰਡ ਤਖਤੂਪੁਰਾ ਪੁੱਜੋ
ਸ਼ਹਾਦਤ ਨੂੰ ਸਿਜਦਾ ਕਰੋ-ਸੰਘਰਸ਼ ਦੀ ਮਸ਼ਾਲ ਹੋਰ ਉੱਚੀ ਕਰੋ
ਖੂੰਨੀ ਹਮਲੇ ਦੀ ਵੰਗਾਰ ਕਬੂਲ ਕਰੋ
  • ਬੀਕੇਯੂ ਏਕਤਾ (ਉਗਰਾਹਾਂ) ਦੇ ਸੂਝਵਾਨ ਅਤੇ ਦਲੇਰ ਆਗੂ ਸਾਧੂ ਸਿੰਘ ਤਖਤੂਪੁਰਾ ਦੀ ਬੇਰਹਿਮੀ ਨਾਲ ਹੱਤਿਆ ਕਰ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਹੈ।ਇਹ ਘਿਨਾਉਣਾ ਖੂਨੀ ਕਾਰਾ ਕਿਸੇ ਨਿੱਜੀ ਦੁਸ਼ਮਣ ਦਾ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਲੋਕ-ਸੇਵਾ ਅਤੇ ਕੁਰਬਾਨੀ ਦੇ ਜਜ਼ਬੇ ਨਾਲ ਭਰਿਆ ਇਹ ਮਕਬੂਲ ਅਤੇ ਸਤਿਕਾਰਤ ਆਗੂ, ਹਰ ਮਨੁੱਖੀ ਦਿਲ ਦਾ ਪਿਆਰ ਅਤੇ ਪ੍ਰਸੰਸਾ ਖੱਟਦਾ ਸੀ। ਨੇਕੀ ਉਸਦੇ ਅੰਦਰ ਵਸੀ ਹੋਈ ਸੀ। ਉਸ ਨਾਲ ਕਿਸੇ ਦੀ ਨਿੱਜੀ ਦੁਸ਼ਮਣੀ ਦਾ ਸਵਾਲ ਹੀ ਪੈਦਾ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ।
  • ਇਸ ਮਿਆਰੀ ਸ਼ਖਸ਼ੀਅਤ ਨੂੰ ਦਰਿੰਦਗੀ ਨਾਲ ਕੋਹ ਕੋਹ ਕੇ ਸ਼ਹੀਦ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਅੰਨੀ ਜਮਾਤੀ ਨਫ਼ਰਤ ਦੀ ਵਿਹੁ ਨਾਲ ਭਰੇ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਦੁਸ਼ਮਣ ਹੀ ਅਜਿਹਾ ਜੁਲਮ ਕਮਾ ਸਕਦੇ ਹਨ। ਸੂਬੇ ਅੰਦਰ ਹੱਕਾਂ ਦੀ ਰਾਖੀ ਲਈ ਜਾਗਰਤ ਹੋ ਰਹੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਅਤੇ ਕਿਰਤੀਆਂ ਦੀ ਉਭਰਦੀ ਜਥੇਬੰਦ ਲਹਿਰ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਸਭਨਾਂ ਦੁਸ਼ਮਣਾਂ ਲਈ ਚੁਣੌਤੀ ਬਣੀ ਹੋਈ ਹੈ। ਵੱਡੇ-ਵੱਡੇ ਧਨਾਢ ਚੌਧਰੀਆਂ ਨੂੰ, ਕਤਲਾਂ ਦੇ ਸ਼ੌਕੀਨ ਪੁਲਸ ਅਫ਼ਸਰਾਂ ਨੂੰ, ਲੋਕ-ਦੁਸ਼ਮਣ ਸਿਆਸਤਦਾਨਾਂ ਨੂੰ, ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਛਿੱਲ ਲਾਹੁੰਦੀ ਭ੍ਰਿਸ਼ਟ ਅਫ਼ਸਰਸ਼ਾਹੀ ਨੂੰ ਅਤੇ ਰੱਤ-ਚੂਸ ਰਾਜਭਾਗ ਦੇ ਮਾਲਕਾਂ ਨੂੰ ਅੰਨ੍ਹੀ ਵਿਹੁ ਚੜ੍ਹੀ ਹੋਈ ਹੈ।
  • ਸਾਧੂ ਸਿੰਘ ਤਖ਼ਤੂਪੁਰਾ ਦੀ ਸ਼ਹਾਦਤ ਰਾਜਭਾਗ ਦੇ ਮਾਲਕਾਂ ਵਲੋਂ ਆਪਣੇ ਹੀ ਅਮਨ-ਕਾਨੂੰਨ ਨੂੰ ਪੈਰਾਂ ਹੇਠ ਲਤਾੜਕੇ, ਲੋਕ ਹੱਕਾਂ ਦੀ ਲਹਿਰ ਨੂੰ ਸਿਆਸੀ ਕਤਲਾਂ ਦੇ ਰਾਜਸੀ ਹੱਥਕੰਡੇ ਰਾਹੀਂ ਨੱਜਿਠਣ ਦਾ ਐਲਾਨ ਹੈ।ਜੱਥੇਬੰਦ ਹੋ ਕੇ ਜੂਝਣ ਦੇ ਰਾਹ ਪਏ ਸਭਨਾਂ ਲੋਕਾਂ ਲਈ ਚੁਣੌਤੀ ਹੈ।ਪਹਿਲਾਂ ਇਸੇ ਨੀਤੀ ਤਹਿਤ ਖੰਨਾ-ਚਮਿਆਰਾ ਵਿਖੇ ਸਿੱਧੀ ਹਕੂਮਤੀ ਪਾਲਸੀ ਤਹਿਤ ਸ਼੍ਰੋਮਣੀ ਗੁਰਦਵਾਰਾ ਪ੍ਰਬੰਧਕ ਕਮੇਟੀ ਦੀ ਟਾਸਕ ਫ਼ੋਰਸ ਨੇ ਦੋ ਮੁਜਾਰੇ ਕਿਸਾਨਾਂ ਨੂੰ ਗੋਲੀਆਂ ਨਾਲ ਭੁੰਨ ਸੁਟਿਆ ਅਤੇ ਨੌਂ ਨੂੰ ਜ਼ਖ਼ਮੀ ਕੀਤਾ ਹੈ।
  • ਇਸ ਕਤਲ ਦੀ ਸਾਜਿਸ਼ ਵਿੱਚ ਸਾਬਕਾ ਅਕਾਲੀ ਐਮ.ਐਲ.ਏ ਵੀਰ ਸਿੰਘ ਲੋਪੋਕੇ ਦੀ ਜੁੰਡੀ ਸ਼ਾਮਿਲ ਹੈ, ਜੋ ਬਾਦਲ ਪਰਿਵਾਰ ਦਾ ਖ਼ਾਸ ਚਹੇਤਾ ਹੈ ਅਤੇ ਜੋ ਆਬਾਦਕਾਰ ਕਿਸਾਨਾਂ ਦੇ ਹੱਕ ਮਾਰਨ ਲਈ ਇਲਾਕੇ ਵਿੱਚ ਬਦਨਾਮ ਭੌਂ-ਮਾਫ਼ੀਏ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਉਸਦਾ ਰਿਸ਼ਤੇਦਾਰ ਬੁੱਚੜ ਥਾਣੇਦਾਰ ਰਛਪਾਲ 'ਬਾਬਾ' ਸ਼ਾਮਲ ਹੈ, ਜਿਸਨੂੰ ਇੱਕ ਕਿਸਾਨ ਦੇ ਕਤਲ 'ਚ ਹੱਥਕੜੀਆਂ ਲਵਾਉਣ ਲਈ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਸੰਘਰਸ਼ ਚੱਲ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਕੇਸ ਦਰਜ ਹੋ ਜਾਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਇਨ੍ਹਾਂ ਮੁਜ਼ਰਮਾਂ ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰਨ ਤੋਂ ਇਨਕਾਰ ਜਾਹਰ ਕਰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਸੂਬੇ ਦੀ ਬਾਦਲ ਹਕੂਮਤ ਦੀ ਕਾਤਲਾਂ ਨੂੰ ਸਿੱਧੀ ਸ਼ਹਿ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੈ।
  • ਆਓ ! ਆਪਣੇ ਸ਼ਹੀਦ ਸਾਥੀ ਦੇ ਡੁਲ੍ਹੇ ਲਹੂ ਦੀ ਲਾਲੀ ਨੂੰ ਅੱਖਾਂ 'ਚ ਵਸਾ ਕੇ ਰੋਹਲੀ ਲਲਕਾਰ ਬਨਕੇ ਉੱਠੀਏ। ਲੋਕ-ਨਫ਼ਰਤ ਦੇ ਸੇਕ ਨਾਲ ਸਿਆਸੀ ਕਾਤਲਾਂ ਦੇ ਮਖੌਟੇ ਲੂਹ ਸੁੱਟੀਏ। ਕਿਸਾਨਾਂ-ਕਿਰਤੀਆਂ ਦੀ ਜੱਥੇਬੰਦ ਲਹਿਰ ਦੀ ਰਾਖੀ ਲਈ ਸਾਂਝੀ ਤਾਕਤ ਦਾ ਕਿਲਾ ਉਸਾਰਕੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਦਾ ਝੰਡਾ ਹੋਰ ਉੱਚਾ ਚੁੱਕੀਏ। ਆਪਣੇ ਪਿਆਰੇ ਆਗੂ ਦੇ ਸ਼ਹਾਦਤ ਦੇ ਝੰਜੋੜੇ ਨੂੰ ਕਿਸਾਨਾਂ-ਕਿਰਤੀਆਂ ਦੇ ਹੱਕਾਂ ਲਈ ਜੂਝਣ ਦੇ ਪ੍ਰਚੰਡ ਇਰਾਦੇ 'ਚ ਬਦਲ ਦੇਈਏ।
ਮੰਗਾਂ
  • ਸ਼ਹੀਦ ਸਾਧੂ ਸਿੰਘ ਤਖਤੂਪੁਰਾ ਦੇ ਕਾਤਲਾਂ ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰਕੇ ਸਖ਼ਤ ਸਜਾਵਾਂ ਦਿਓ
  • ਆਬਾਦਕਾਰਾਂ ਨੂੰ ਮਾਲਕੀ ਦੇ ਹੱਕ ਤੁਰੰਤ ਦਿਓ
  • ਥਾਣੇਦਾਰ ਰਛਪਾਲ 'ਬਾਬਾ' ਨੂੰ ਦੋਹੇਂ ਕਤਲਾਂ ਵਿਚ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰੋ
  • ਖੰਨਾ-ਚਮਿਆਰਾ ਕਤਲਕਾਂਡ ਦੇ ਦੋਸ਼ੀਆਂ ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰਕੇ ਸਖ਼ਤ ਸਜਾਵਾਂ ਦਿਓ

ਵਲੋਂ:

  1. ਭਾਰਤੀ ਕਿਸਾਨ ਯੂਨੀਅਨ ਏਕਤਾ(ਉਗਰਾਹਾਂ)
  2. ਭਾਰਤੀ ਕਿਸਾਨ ਯੂਨੀਅਨ ਏਕਤਾ(ਡਕੌਂਦਾ)
  3. ਕਿਰਤੀ ਕਿਸਾਨ ਯੂਨੀਅਨ
  4. ਪੰਜਾਬ ਕਿਸਾਨ ਯੂਨੀਅਨ
  5. ਭਾਰਤੀ ਕਿਸਾਨ ਯੂਨੀਅਨ(ਕ੍ਰਾਂਤੀਕਾਰੀ)
  6. ਕਿਸਾਨ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਮੇਟੀ(ਸਤਨਾਮ ਪੰਨੂ)
  7. ਕਿਸਾਨ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਮੇਟੀ(ਕੰਵਲਪ੍ਰੀਤ ਪੰਨੂ)
  8. ਜਮਹੂਰੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ
  9. ਪੰਜਾਬ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ
  10. ਕਿਰਤੀ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ,ਪੰਜਾਬ
  11. ਪੰਜਾਬ ਕਿਸਾਨ ਸਭਾ
    1. ਭਾਰਤੀ ਕਿਸਾਨ ਯੂਨੀਅਨ ਏਕਤਾ(ਸਿੱਧੂਪੁਰ)
    2. ਖੇਤੀਬਾੜੀ ਤੇ ਕਿਸਾਨ ਵਿਕਾਸ ਫਰੰਟ
    3. ਪੰਜਾਬ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ
    4. ਪੇਂਡੂ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ(ਮਸ਼ਾਲ)
    5. ਪੇਂਡੂ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ,ਪੰਜਾਬ
    6. ਮਜ਼ਦੂਰ ਮੁਕਤੀ ਮੋਰਚਾ,ਪੰਜਾਬ
    7. ਕ੍ਰਾਂਤੀਕਾਰੀ ਪੇਂਡੂ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ
    8. ਦਿਹਾਤੀ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ
    9. ਕੁਲ ਹਿੰਦ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ,ਪੰਜਾਬ
    10. ਪੰਜਾਬ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ
    11. ਕ੍ਰਾਂਤੀਕਾਰੀ ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰ ਸਭਾ,ਪੰਜਾਬ

ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਕ: ਸੁਖਦੇਵ ਸਿੰਘ ਕੋਕਰੀ ਕਲਾਂ, ਮਿਤੀ:23.2.2010

Thursday, January 21, 2010

PROTEST AGAINST OPERATION GREEN HUNT

PEASANTS & FARM LABOURERS HOLD DHARNA

DEMAND RELEASE OF THEIR LEADER ARRESTED FOR BEING "MAOIST"


Bharti Kissan Union Ekta (Ugrahan) and BKU (Dakonda) today held a state level massive Dharna at Bathinda, demanding unconditional release of Sh. Surjit Singh Phul, State President BKU (Krantikari), who was arrested under the Unlawful Activities Act and charged with being a Maoist.The Dharna was supported by various organisations of agricultural labourers and BKU (Krantikari). Given above are some of the photographs of this Dharna:




Thursday, July 2, 2009

Punjab Protest Against Lalgarh Atrocities

COMMITTE FORMED TO PROTEST AGAINST REPRESSION ON LALGARH PEOPLE
A' Committee Against Repression On Lalgarh People' has been formed in Punjab today. It consists of three members, who are well-known leaders of democratic-revolutionary organisations, namely- Kanwaljit Khanna (Inqulabi Kender, Punjab), Balwant Makhu (Lok Sangram Manch) and Amolak Singh (Lok Morcha Punjab). The Committee in its first meeting held has decided to hold a protest demonstration at Moga on 10.7.09. Lok Morcha Punjab endorsing this call has called upon all its members and sympathisers to participate in the protest demonstration in full strength to show their solidarity with the struggling people of Lalgarh.