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Saturday, December 24, 2011

THE TRAGEDY OF SONI SORI -A TRIBAL TEACHER

"तमाम ज़ख्मों के मुंह खुले हैं, सवाल पूछो जवाब मांगो”

हमें रिमांड में रखकर दंतेवाड़ा पुलिस थाने में एसपी अंकित गर्ग और मानकर ने इतने भयानक तरीक़े से करंट देकर ज़हनी और जिस्मानी तौर पर जो अज़ीयत दी है, और जो अंदरूनी ज़ख़म मुझे लगे हैं वो में चाहकर भी भूल नहीं सकती। अगर मैं गुनाहगार थी तो मुझे पूछताछ के बाद अदालत में पेश करना था...
निसार अहमद खान
sonisori_chhattisgarhसोनी सोरी... आज बस ये सिर्फ एक नाम ही नहीं रह गया है, बल्कि सरकारी दहश्तगर्दी और पुलिस की बरबरीयत और ज़ुलम-ओ-सितम की एक पहचान बन गई है। इंसानों पर किए जाने वाले ज़ुलम-ओ-सितम के बारे में जो कुछ भी आप सोच सकते हैं, शायद इससे कुछ ज़्यादा ही सोनी सोरी भुगत रही है। जो कुछ आज सोनी सोरी के साथ हो रहा है वो उल-मनाक और दर्दनाक तो है ही, मगर साथ ही इस सूरत-ए-हाल ने हमारे निज़ाम-ए-अदल, नज़म वनसक़ और हुकूमती तरीक़ अमल से मुताल्लिक़ मुतअद्दिद सवालात भी खड़े कर दिए हैं। जो न सिर्फ तशवीशनाक हैं बल्कि इस बात के मुतक़ाज़ी भी हैं कि उन पर फ़ौरी तवज्जो दी जाए और उनको हल करने के लिए अमली जद्द-ओ-जहद का आग़ाज़ कर दिया जाए।
सोनी सोरी आज एक मुल्ज़िमा है, अदालती हिरासत के तहत जेल में मुक़य्यद है। कई मुक़द्दमात का सामना कर रही हैं। इस पर एक कांग्रेसी लीडर पर हमला करने, एक तहसील पर बम मारने और माओ नवाज़ो (Maoists) को फ़ंड फ़राहम करने में मदद देने के इल्ज़ामात हैं। मुआमला मुल़्क की आला तरीन अदालत में ज़ेर-ए-समाआत है। जो इस बात का तक़ाज़ा करता है कि सोनी सोरी के बारे में इज़हार-ए-ख़्याल के वक़्त अलफ़ाज़ का इंतिख़ाब और उनकी बंदिश पर ख़ुसूसी तवज्जो दी जाये। अदालती हुर्मत और एहतिराम का ख़ास ख़्याल रखा जाय, क्योंकि कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि “उन्हें वो बात बुरी लग जाती है जिसका ज़िक्र सारे फ़साने में नहीं होता।”
सोनी सोरी के बारे में इज़हार राय ज़रूरी है, इज़हार-ए-ख़्याल और बड़े पैमाने पर बेहस वमबाहसा ज़रूरी है, आज भारत और बैन-उल-अक़वामी सतह की हक़ूक़-ए-इंसानी के लिए काम करने वाली बाज तंज़ीमें इंसानी हुक़ूक़ की पामाली का शिकार सोनी सोरी के मुआमले को उजागर करने में लगी हैं। सोनी सोरी के साथ किए गए ज़ालिमाना और इंसानियत को शर्मसार करने वाले वाक़ियात की मुज़म्मत की जा रही है और मुतालिबा किया जा रहा है कि सोनी सोरी को ज़हनी, जिस्मानी और जिन्सी ज़्यादती और इंतिहाई दर्जा की बरबरीयत का निशाना बनाने वाले पुलिस अहलकारों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाये।
हममें से बहुत से लोग नहीं जानते की हमारे प्यारे देश भारत में इंसानी हुक़ूक़ की पामाली के वाक़ियात कितने बढ़ गए हैं , और उ में दिन-ब-दिन इज़ाफ़ा ही होता जा रहा है। हुकूमत और हुकूमती इदारों को हासिल ला महिदूद इख़्तयारात और AFSPA जैसे सियाह क़वानीन के बोझ तले इंसानियत कराह रही है, जवाबदेही का कोई तसव्वुर बाक़ी नहीं रहा, पुलिस हिरासत में अम्वात में तशवीशनाक हद तक इज़ाफ़ा हुआ है और झूठे एनकाउंटर के नाम पर क़तल व ग़ारतगरी का बाज़ार गर्म है। सिर्फ एक मिसाल से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सूरत-ए-हाल कितनी भयानक है। दो नवंबर 2000 को इम्फाल वैली के एक गाँव मालूम में Armed Forces (Special Powers) Act, 1958 (AFSPA) के भयानक नतीजे देखने के बाद मणिपुर की एक 24 साला ख़ातून इरोम शर्मीला ने 4 नवंबर 2000 से ग़ैर मुअय्यना मुद्दत की भूख हड़ताल कर रखी है, जो आज भी जारी है। किसी क़ानून को मंसूख़ किए जाने के मुतालिबा के हवाले से की जाने वाली ये दुनिया की ये सबसे तवील तरीन भूख हड़ताल है, जो हमारे मुल्क में जारी है।
इरोम शर्मीला चुनो ने 4 नवंबर 2000 से न ही खाना खाया है और न ही पानी पिया है। उसे ज़िंदा रखने के लिए नाक में नली के जरिये कुछ ग़िज़ा दी जाती है। भूख हड़ताल के तीसरे दिन ही उसे इंडियन पैनलकोड की दफ़ा 309 के तहत इक़दाम ख़ुदकुशी के जुर्म में गिरफ़्तार कर लिया गया था। एक साल बाद उसे छोड़ दिया जाता है, मगर बाद में फिर गिरफ़्तार कर लिया जाता है। वर्ष 2000 से हर साल ये सिलसिला जारी है। पाँच सौ हफ़्तों से ज़्यादा भूख हड़ताल पर रहने वाली इरोम शर्मीला चुनो आज भी जेल में क़ैद है। इस सारी भयानक सूरत-ए-हाल के नतीजा में ज़ुलम-ओ-बरबरीयत के शिकार अफ़राद की तादाद बढ़ती ही जा रही है। कितने ही नाम हैं जो गिनाए जा सकते हैं, डाक्टर बिनायक सेन, लिंगाराम कोडोपी, अरूण फ़रेरा और सोनी सोरी वग़ैरह।
सोनी सोरी की कहानी भी बड़ी अजीब, करब अंगेज़ और दिल दहला देने वाली है। छत्तीसगढ़ के दंतेवाडा इलाके की 36 साला सोनी सोरी सहाफ़ी लिंगा राम कोडोपी की फूफी ( बोह) हैं। सरकारी मुलाज़िम हैं और जंगलों के बीच वाक़्य एक देही इलाक़ा में स्कूल की टीचर हैं। उनके शौहर भी पहले से ही किसी मुक़द्दमा के तहत जेल में क़ैद हैं (कहा जाता है कि उन्हें भी किसी झूठे मुकदमे में फंसाया गया है )। सोनी सोरी के 6 , 10 और 12 साल के तीन बच्चे हैं जो आजकल किसी दौर के रिश्तेदार के रहमोकरम पर हैं। भतीजा सहाफ़ी लिंगा राम कोडोपी भी जेल में बंद है। उसकी कहानी भी अलग तफ़सील तलब है। पुलिस उन पर माओविस्ट ( MAOISTS) की मदद करने का इल्ज़ाम लगाती हैं। वो इस इल्ज़ाम से इनकार करती रही हैं, इसके पास उसके अपने दलायल हैं। कई सबूत हैं जो इसने अपनी बेगुनाही को साबित करने के लिए अदालत के सामने रखे हैं।
सोनी सोरी यूं तो पिछले 2 सालों से परेशानियों और मुसीबतों का सामना कर रही है, मगर उसकी परेशानियों और करब भरी दास्तान का दूसरा दौर उस वक़्त शुरू हुआ जब 4 अक्तूबर 2011 को सोनी सोरी को दिल्ली पुलिस ने छत्तीसगढ़ पुलिस के साथ मिलकर दिल्ली में गिरफ़्तार कर लिया। सोनी सोरी छत्तीसगढ़ पुलिस की हिरासानिऊ से बचते-बचाते दिल्ली आई थी , ताकि अपनी बात अदालत के सामने रखकर ख़ुद पर हो रहे ज़ुलम-ओ-सितम से बच सके। वो ज़िंदा और सही सलानत तो दिल्ली पहुंच गई थी, लेकिन इसके सामने ख़दशात थे, उसे अपनी जान का ख़तरा था।
गिरफ़्तारी के बाद इसने अदालत से बार-बार इल्तिजा की कि उसे छत्तीसगढ़ पुलिस के हवाले न किया जाय, क्योंकि वहां उसे छत्तीसगढ़ पुलिस की जानिब से अपनी जान और इज़्ज़त-ओ-अब्रू का ख़तरा है, बेपनाह और जानलेवा तशाद्दुद का ख़तरा है। मगर दिल्ली में अदालत ने इस के इन ख़दशात को नजरअंदाज़ करते हुए उसे छत्तीसगढ़ पुलिस के हवालेकर दिया और छत्तीसगढ़ पुलिस को हिदायत दी कि सोनी सोरी की हिफ़ाज़त से मुताल्लिक़ तमाम इक़दामात किए जाएं और तमाम हिफ़ाज़ती अमोर को यक़ीनी बनाया जाय। लेकिन इसके बावजूद सोनी सोरीके बदतरीन ख़दशात बिलाखेर सच्च साबित हो ही गए। छत्तीसगढ़ पुलिस की जानिब से गिरफ़्तार किए जाने के बाद पुलिस लॉकअप में न जाने क्या हुआ पता नहीं, लेकिन दुनिया ने वो वीडियो क्लिप देखा, जिसे देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, अस्पताल के एक टेबल पुर दर्द-ओ-करब से चीख़ती और कराहती हुई सोनी सोरी की वो तस्वीरें अगर आप में हिम्मत है तो आप भी देख सकते हैं http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=a5lO6cEcUeI#!
जब इस वाक़िया के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठने लगी, तो पुलिस ने ये बयान दिया कि सोनी सोरी पुलिस लॉकअप के बाथरूम में फिसल कर गिर गई ! या अलहि ये माजरा किया है? यहां डाक्टरों ने दूसरी बातों के अलावा ये भी रिपोर्ट दी कि उसके दोनों हाथों की दरमयानी ऊँगली पर काले निशानाथ हैं। ( सोनी सोरी के वकील और दीगर इंसानी हक़ूक़ के लिए काम करने वालों का कहना है कि ये निशानात पुलिस लॉकअप में अलकटरक शॉक देने की वजह से बने हैं) सोनी सोरी की तशवीशनाक हालत देखकर डाक्टर ने मज़ीद मुआयना के लिए बड़े अस्पताल में ले जाने के लिए कहा। छत्तीसगढ़ पुलिस के जरिये पहले जागदालपोर और बाद में रायपुर के दवाख़ानों में दो मर्तबा मुआयना किया गया, मगर कोई ख़ास बात सामने नहीं आई। इससे क़बल दंतेवाड़ा के अस्पताल के डाक्टरों ने जो रिपोर्ट दी थी, उसकी भी तौसीख नहीं की।
इस सूरत-ए-हाल को देखते हुए सोनी सोरी के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में एक दरख़ास्त दाख़िल की कि सोनी सोरी की ख़राब हालत के पेशेनज़र इसका मेडिकल चैकअप आज़ादाना तौर पर किसी दूसरे मुक़ाम पर क्या जाय। हुकूमत छत्तीसगढ़ ने इस बात से इनकार किया कि सोनी सोरी पर तशद्दुद किया गया, मगर अदालत ने ये दरख़ास्त मंज़ूर कर ली और कलकत्ता में दुबारा मेडिकल चैकअप किया गया ।फिर इंसानियत का सर शर्म से झुका देने वाली वो मेडिकल रिपोर्ट सामने आई जिसे कहने और सुनने के लिए भी दिल गर्दा चाहिए। उसकी शर्मगाह से और पिछले हिस्से ( मक़अद ) से डाक्टरों ने पत्थर बरामद किए। उर्दू में इससे ज़्यादा लिखने की हिम्मत मुझ में नहीं है, इस लिए इस मेडिकल रिपोर्ट से मुताल्लिक़ चंद अलफ़ाज़ अंग्रेज़ी में यहां नक़ल करता हूँ-
The recently received an independent medical examination report of Soni Sori, has revealed that two large stones were planted deep inside her vagina and another stone inside her rectum.
इस सिलसिले में एक और दिलचस्प बात नोट करने के काबिल है कि कलकत्ता के एनआरएस मेडिकल कॉलिज के जरिये स्पीड पोस्ट से रवाना की गई ये रिपोर्ट 13 दिनों तक भी जब सुप्रीम कोर्ट को नहीं पहुंची तो अदालत ने मेडिकल कॉलिज को हिदायत दी कि अदालत को फ़ौरी फ़याकस या ईमेल के जरिये ये रिपोर्ट रवाना की जाय। बहरहाल, जब अदालत को ये रिपोर्ट मिली तो जज साहिबान ने इस रिपोर्ट पर अपने कोफ़त, रंज और तकलीफ़ का इज़हार किया और रियासती हुकूमत को हिदायत दी कि सोनी सोरी को रायपुर की जेल मुंतक़िल कर दिया जाय। साथ ही उन्होंने तक़रीबन डेढ़ माह बाद यानी जनवरी 2012 को आख़िरी समाअत की तारीख़ मुक़र्रर की।
यूं तो सोनी सोरी के मुताल्लिक़ कहने को और बहुत कुछ है, मगर आख़िरी चंद बातें इसके दो ख़ुतूत से, एक जो इसने अपने घरवालों को लिखा है और दूसरा जो इस ने सुप्रीम कोर्ट के जज साहिबान के नाम लिखा है । अपने घरवालों को लिखे गए ख़त में सोनी सोरी ने लिखा है कि मुझे जिस किस्म की अज़ीयतें दी जा रही हैं वो में आपको बयान नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट के जज साहिब के नाम लिखे गए अपने ख़त में सोनी सोरी सवाल कर रही है कि “मैं सुप्रीम कोर्ट से ये जानना चाहती हूँ कि आज मेरी इस हालत का ज़िम्मेदार कौन है? अदलिया, पुलिस, इंतिज़ामीया या हुकूमत?। हमें रिमांड में रखकर दंतेवाड़ा पुलिस थाने में एसपी अंकित गर्ग और मानकर ने इतने भयानक तरीक़े से करंट देकर ज़हनी और जिस्मानी तौर पर जो अज़ीयत दी है, और जो अंदरूनी ज़ख़म मुझे लगे हैं वो में चाहकर भी भूल नहीं सकती। अगर मैं गुनाहगार थी तो मुझे पूछताछ के बाद अदालत में पेश करना था, अदालत ख़ुद फ़ैसला करती कि सज़ा देना या ना देना।जज साहिब ये कैसा क़ानून है,एक बेगुनाह होते हुए भी मैं सज़ा भगत रही हूँ। मेरा क़सूर किया है ?
क़सूर किसका है ये तो आने वाला वक़्त ही बताएगा। मगर आज सोनी सोरी का हर ज़ख़म खुला है। मरहूम अहसन यूसुफ़ ज़ई का ये शेर इस पर पूरी तरह सादिक़ आता है।
"तमाम ज़ख़मों के मुंह खुले हैं
सवाल पूछो , जवाब मांगो."

Courtsey: JANJWAR 

Thursday, December 15, 2011

जीतन मरांडी की फांसी की सजा रद्द- JATIN MARANDI ACQUITTED BY HC

जीतन मरांडी की फांसी की सजा रद्द
Jatin Marandi being taken to court

Jatin Marandi on stage

Volunteers of DFAOGH Punjab Marching at Moga with Jatin Marandi's photograph, demanding revocation of his death sentence.

(Jiten Marandi - a cultural activist from Jharkhand and one of the secretaries of Committee for the Release of Political Prisoners was arrested in 2008 and accused by the police of being involved in the murder of 20 villagers, including the son of former Jharkhand chief minister Babulal Marandi, in Chilkari in 2007. He was sentenced to death in June 2011 by a lower court in Jharkhand. He has been an active participant in the movements against forcible land acquisitions in Jharkhand - and was actually arrested while he was on the way back from one such rally organized by the Visthapan Virodhi Jan Vikash Andolan, almost an year after the killings
He gave cultural expression to the pain and anguish of the working people and their struggles… who moved around with his cultural troupe from the fields, factories and mines to the villages, suburbs, and cities singing songs on peoples’ culture. He  rekindled the hopes of Hul-Ulgulan –rebellion against exploitation– for the rights over Jal-Jangal-Zameen and life among the oppressed and discriminated adivasis and the labouring people. He filled the hearts of the people, plundered and deceived by the government, with a craving for social transformation to reclaim the right to a life of dignity, land and wellbeing. He became the lyrical consciousness of the struggle to build a new society and a new power, the struggle of light against darkness, of the hungry against hunger. He was condemned to death for the crime of murder which he did not commit.
A large number of noted intellectuals from Jharkhand such as Dr. B. P. Kesari (Senior Writer), Sten Swamy (Human Rights Activist), Sashi Bhushan Pathak (PUCL), Anil Anshuman (Cultural artist), Prof. Ravi Bhushan (Writer), Dr. Rose Kerketta (Linguist), Dr. Shambhu Badal (Editor, ‘Prasang’), Prof. Vidya Bhushan (Writer), Meghnath (Film-maker), Nirmala Putul (Poet), Shishir Tudu (Writer), Prof. Maya Prasad (Writer), Mukund Nayak (Peoples’ Artist), Prof. Ramesh Sharan (Economist), Sudhirpal (Journalist), Prof. Mithilesh (Teachers’ Leader), Virendra (Editor, ‘Gotia’), Sitaram Sastri (Social Activist), Sanjaya Basu Mallick (Jangal Bachao Andolan), Dayamani Barla (Social Activist), , P. P. Verma (Social Activist), Arvind Avinash (Nagarik Adhikar Andolan), Xavier Kujur (JGSM), Sunil Minz (Journalist), Aloka (IPTA), K. N. Pandit (VVJVA), Damodar Turi (VVJVA), Sunita (AIPWA), Jharkhand Jan Sanskriti Manch, Jharkhand Bachao Andolan, Jangal Bachao Andolan, Jharkhand Alternative Development Forum, Trivani Singh (Editor, ‘JanJwar’), Munni Kachap, (Mahila Ulgulan Sangh), Aarti Kujur,(Member,Jila Parisad), Sambhu Mahto(CPI(ML)), Keya Dey(All India Mahila Sanskritik Sanghatan, SUCI), arun Jyoti(social activist), Sudhir Tete( social activist), Amar Kumar (Advocate, Ranchi Civil Court), Susanto Chaterji (Marxvadi Samanvay Samiti), Ahmad Rajja (Advocate, HRLN), KD Singh(CPI, Joint State Secretary), Rajdev Prasad Chandarvansi (Advocate), Hul Jharkhand Kranti Dal, Anjani Pandey (CPI(ML)), raised their voice against the death sentence awarded to him and launched a compaign to get it revoked .
At the national level Dr. Binayak Sen, Arundhati Roy, Himanshu Kumar and many others raised their voice in his support.

The Democratic Front Against Operation Green Hunt Punjab, has been in the forefront protesting against death sentence awarded to Jatin Marandi, a peoples cultural activist of Jharkhant, who led the masses in struggle against neo-liberal anti-people policies of the Govt. It has been consistely raising demand for revocation of this death sentence and his unconditional release from the jail. In the conventions held at Punjabi Bhawan Ludhiana on 12th November and Bhaini Bagha on 13th November, resolutions were adopted against the death sentence imposed upon Jatin Marandi.

In the Convention held at Moga on 10th December, on the International Human Rights Day, the issue of Jatin Marandi was prominently discussed. Almost all the speakers devoted considerable time detailing various aspects of his case and demanded revocation of his death sentence. A Signature campaign was also initiated in this regard.

We are happy that today Jharkhand High Court has acquitted Jatin Marandi along with three others, finding gaping holes in the evidence against them. We are thankful to all those, especially the intellectuals – Advocates, doctors, writers, cultural activists, Professors, Teachers, Trade Unionists, Mass leaders etc of Punjab, who supported our campaign.

Dr. Parminder Singh                                              Advocate N.K.Jeet
Co Convener DFAOGH Punjab                            State Committee Member DFAOGH Punjab
                                                                             Mob: 94175-07363

 We are publishing below a write-up fron Janjwar:

फांसी की सजा भुगत रहे आदिवासी लोक कलाकर जीतन मरांडी की फांसी सजा झारखंड उच्च न्यायालय ने आज रद्द कर दी। दिन के करीब 12 बजे आये इस फैसले में जज ने माना कि जीतन मरांडी को गलत ढंग से फंसाया गया...
जनज्वार. फांसी की सजा भुगत रहे आदिवासी लोक कलाकर जीतन मरांडी समेत अन्य तीन लोगों को हुई फांसी की सजा को झारखंड उच्च न्यायालय ने आज रद्द कर दिया। इन सभी लोगों को राज्य की एक निचली अदालत ने 22 जून को चिलखारी हत्याकांड का दोषी मानकर फांसी की सजा सुनाई थी।
झारखंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीश आरके मराठिया और डीएन उपाध्याय की संयुक्त पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि दोषियों पर निचली अदालत ने जो अपराध तय किये थे, वह निराधार थे। मरांडी के वकील एसके मुरारी ने बताया कि उच्च अदालत द्वारा निचली अदालत के फैसले को गलत ठहराने का बुनियादी कारण गवाहों का फर्जीवाड़ा बना, जिसमें कई गवाह ऐसे थे जो व्यावसायिक तौर पर गवाही देने का पेश करते हैं या फिर इनमें से कुछ गवाहों पर आपराधिक मामले पहले से दर्ज हैं। 
दिन के करीब 12 बजे आये फैसले में पीठ ने कहा कि जीतन मरांडी, अनील राम, छत्रपति मंडल और मनोज रजवार को गलत ढंग से फंसाया गया। जनहित में हुए इस फैसले के बाद झारखंड के राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ताओं में जश्न का माहौल है और लोग खुश हैं कि देर से सही मगर सचाई की जीत हुई है।
फांसी की सजा से मुक्त हुए लोगों में अनील राम, छत्रपति मंडल और मनोज रजवार जेल से कल छूट सकते हैं, जबकि लोक कलाकार जीतन मरांडी पर राज्य के खिलाफ भड़काउ भाषण देने का एक और अन्य मुकदमा होने के कारण उनकी रिहाई सोमवार तक हो सकती है।

जीतन मरांडी की पत्नी अर्पणा मरांडी:
"मैं बहुत खुश हूं कि देर से ही सही न्याय तो मिला। मैं इस न्याय के लिए विशेष रूप से उच्च न्यायालय के जज और अपने वकील एसके मुरारी का शुक्रिया करना चाहूंगी, जिनके बदौलत हमारे पति समेत बाकी तीन निर्दोष जेल से रिहा हो सके हैं। वकील एसके मुरारी ने बिना फीस लिये यह लड़ाई लड़ी है जो देश के जनपक्षधर वकीलों के लिए यह एक मिसाल है। झारखंड की जेलों में अभी बहुत से लोग बंद हैं और हमारे पति जैसे ही निर्दोष हैं। अगर वह बाहर आयें तो हमें और ख़ुशी होगी। उनके बगैर हमारी ख़ुशी अधूरी है। इस संघर्ष में देश स्तर पर खासकर झारखंड के सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं, छात्रों, बुद्धिजीवियों, शुभचिंतकों ने जो एकता दिखायी है, प्रयास किया है, उसके लिए मैं उन सभी की आभारी हूं। "
माओवादी विद्रोहियों द्वारा 2008 में अंजाम दिये गये चर्चित चिलखारी हत्या कांड में आरोपी के तौर पर लोक कलाकार जीतन मरांडी, अनील राम, छत्रपति मंडल और मनोज रजवार को गिरफ्तार किया था, जिन्हें इस वर्ष 22 जून को गिरिडिह के अतिरिक्त और सत्र न्यायधीश ने फांसी की सजा सुनायी थी। चिलखारी कांड में 20 लोग मारे गये थे। मरने वालों में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड विकास पार्टी के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी का बेटा अनूप मरांडी भी मारा गया था।
वरिष्ठ पत्रकार और रांची के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता फैसल अनुराग ने कहा कि यह फैसला जनतांत्रिक शक्तियों की जीत का फैसला है। इसने एक बार फिर साबित किया है कि राज्य अपने ही नागरिकों खिलाफ कितने सुनियोजित षड्यंत्र करता है।’ हालांकि अनुराग कहते हैं कि झारखंड की जेलों में करीब 3500 कैदी हैं जो इसी तरह के फर्जी मामलों में फंसाये गये हैं। और जबतक हमलोग उन्हें सरकारी यातनाओं से मुक्त कराने में सफल नहीं होते तबतक यह लड़ाई अधूरी ही है।
Courtsey: JANJWAR  Thursday, 15 December 2011 16:55

Tuesday, December 13, 2011

DFAOGH PUNJAB PROTESTS ATTACK ON DEMOCRATIC RIGHTS OF PEOPLE


MOGA CONVENTION AGAINST ATTACK ON DEMOCRATIC RIGHTS











 The Democratic Front Against Operation Green Hunt, Punjab held a well-attended convention at Moga on the International Human Rights Day i.e. 10th December. The convention held in the back-drop of killing of M. Koteswara Rao @ Kishenji - the CPI (Maoist) leader in an “encounter” mired in suspicion; death sentence awarded to Jatin Marandi-the peoples singer and theater-artist of Jharkhand; brutal & inhuman torture inflicted by Chhattisgarh Police on a tribal teacher, Soni Sori and a decade long fast by Irom Sharmila, the indomitable woman from Manipur, in protest against continuation of draconian Armed Forces Special Powers Act; was to focus on the significance of these events from the standpoint of human rights movement in the country and to chalk out its future direction.

As a prelude to this convention, a press briefing was held at Desh Bhagat Yadgar Hall Jalandhar on 4th December on these issues. The fact finding report prepared by the Coordination of Democratic Rights Organizations (CDRO), about the killing of Kishenji was translated and printed in Punjabi and widely circulated amongst democratic sections throughout Punjab.
The convention venue, Shaheedi Park was decorated with flexes, banners and placards having photographs of Kishenji, Jatin Marandi & Irom Sharmila and slogans highlighting struggle and demands for protection of democratic rights. A presidium consisting of Prof A.K.Maleri, Prof. Baldeep Singh, Narbhinder Singh & Attarjit Singh Kahanikar, all State Committee members of the DFAOGH Punjab, was constituted to conduct the Convention. The stage was conducted by Sh. Balwant Makhu.

Opening the discussion, Advocate N.K.Jeet, asserted that with the onset of neo-liberal economic policies, the state has opened the floodgates to MNC’s entry in the country, facilitating their predatory activities by handing them over the Jal, Jangal & Jameen, along with generous tax incentives. The rulers are hell bent upon mortgaging this country to the imperialists giving them unquestioned right to plunder its natural resources, including cheap labor. Vast majority of the people throughout the country are opposing these neo-liberal policies, being implemented under the misleading label of economic reforms. The struggles of the people against these policies are bursting out widely and intensively, despite indifference, rather opposition from the parliamentary parties and ruthless repression by the state. To make the people’s resistance movements leaderless and ineffective the rulers are resorting to killing their leaders in fake encounters, implicate them in false criminal cases and award them death sentence or life imprisonments. The rules are using their private armies such as Salwa Judam, Ma Danteswari Sena, Bhairav Vahini, Harmads, SOI (Students Organization of India) etc for inflicting violence and spying upon the people’s movements. The rulers have also armed themselves with numerous undemocratic black laws such as Sedition law, UAPA, AFSPA etc. The brutal torture inflicted upon Soni Sori is unprecedented in our history. Deriving sadistic pleasure, the Chhattisgarh Police under the personal supervision of SP Ankit Garg, thrust stones in her both private parts. It is highly barbaric. However as the people’s movements to protect their Jal, Jangal & Jameen, gather momentum, and the women have become an integral part of these, they have increasingly come under attack and have faced police brutalities in Singur, Nandigram, Jangal Mahal, Bastar, Dantewada, POSCO, Gobindpura and more recently at Daula village in Punjab, where an Akali Sarpanch slapped in full public view, in the presence of police officials, an EGS lady teacher, protesting against contract system of employment.
N.K.Jeet called upon the democratic minded people to come forward, unite and wage a relentless struggle against these attacks on their democratic right of struggle for a better future.

Sh. Rajiv Gondara Advocate from Chandigarh spoke at length about fake encounters and black laws. He said that the police is not following the law and procedures prescribed by various High Courts and the Supreme Court. Law does not authorize the police to kill any one. The facts brought out in the CDRO report raise suspicion about the authenticity of police version of killing of Kishenji. To bring out the truth, the alleged encounter needs to be probed by a High Court or Supreme Court Judge. He expressed his total opposition to death penalty and demanded that it should be scrapped. He regretted that while Parliament is considering a law against torture, the police is subjecting the struggling people to most inhuman and barbaric methods of torture, as in the case of Soni Sori. Spontaneous struggles of the people are erupting against the neo-liberal policies of the Govt throughout the country. The democratic minded people should devise appropriate ways and means to come out in support of these struggles. He highlighted the need to fight against the present cruel and exploitive system. He demanded revocation of all black laws especially the UAPA and the AFSPA, and saluted Irom Sharmila for her relentless struggle against black laws.

Dr. Parminder Singh, Co-convener DFAOGH Punjab, speaking on the occasion raised questions on the alleged encounter in which Com Kishenji was killed. He demanded a judicial inquiry in the matter and registration of criminal case against the police officials involved in it. The neo-liberal policies of the ruling classes were successfully defeated by the struggling people in Nandigram, Singur, Jangalmahal etc. The state has hit against the people by killing Kishenji. The state conducts fake encounters and tries to cover these up by churning out lies. It is the democratic right of every individual to aspire for a better world and to struggle for creating it. We must prepare a blue-print for the new world, an alternative to the existing repressive, undemocratic and exploitative socio-economic set-up and oppose all the undemocratic acts of the rulers.

The Convention unanimously adopted various resolutions presented by Prof. A.K.Maleri demanding a judicial inquiry in the political murder of Com Kishenji, setting aside the death sentence awarded to Jatin Marandi, reocation of AFSPA and saving the life of Irom Sharmila, lifting the ban on CPI Maoist and its front organizations, withdrawal of all repressive measures against the ongoing peoples struggles in various parts of the country etc.

The convention decided to undertake a signature campaign on all the above issues on a resolution moved by Prof Baldeep Singh.
A massive procession was taken out from the venue of the convention to General Bus Stand raising slogans in support of the people’s struggles, democratic rights and against the fake encounters.   


Monday, December 12, 2011

ਪ੍ਰਚੂਨ-ਕਾਰੋਬਾਰ ਵਿਚ ਵਿਦੇਸ਼ੀਆਂ ਨੂੰ ਖੁੱਲ• - ਸਰਕਾਰ ਦਾ ਮੁਲਕ ਤੇ ਲੋਕ-ਦੋਖੀ ਫੈਸਲਾ

ਪ੍ਰਚੂਨ-ਕਾਰੋਬਾਰ ਵਿਚ ਵਿਦੇਸ਼ੀਆਂ ਨੂੰ ਖੁੱਲ• - ਸਰਕਾਰ ਦਾ ਮੁਲਕ ਤੇ ਲੋਕ-ਦੋਖੀ ਫੈਸਲਾ
ਸਰਕਾਰੀ ਨੀਤੀ-ਚਾਲ ਸਮਝੋ। ਵਿਰੋਧ ਲਹਿਰ ਵਿਸ਼ਾਲ ਕਰੋ

ਪ੍ਰਚੂਨ-ਕਾਰੋਬਾਰ ਨਾਲ ਜੁੜੇ ਭਰਾਵੋ,

ਤੁਸੀਂ, ਕੇਂਦਰ ਸਰਕਾਰ ਵੱਲੋਂ ਪ੍ਰਚੂਨ-ਕਾਰੋਬਾਰ ਵਿਚ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਕੰਪਨੀਆਂ ਦੇ ਦਾਖਲ ਹੋ ਸਕਣ ਦੇ ਕੀਤੇ ਫੈਸਲੇ ਦੇ ਵਿਰੋਧ ਵਿਚ ਰੋਸ ਪ੍ਰਗਟਾ ਰਹੇ ਹੋ। ਸੰਘਰਸ਼ ਕਰ ਰਹੇ ਹੋ।

ਅਸੀਂ, ਲੋਕ ਮੋਰਚੇ ਵਾਲੇ ਤੁਹਾਡੇ ਨਾਲ ਹਾਂ। ਅਸੀਂ, ਸਰਕਾਰਾਂ ਵੱਲੋਂ ਮੁਲਕ ਤੇ ਲੋਕ-ਦੋਖੀ ਲਏ ਫੈਸਲਿਆਂ, ਚੱਕੇ ਕਦਮਾਂ ਤੇ ਘੜੀਆਂ ਨੀਤੀਆਂ ਖਿਲਾਫ਼ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਲੋਕ-ਹਿੱਸਿਆਂ ਦੇ ਸੰਘਰਸ਼ਾਂ ਦੇ ਸਦਾ ਅੰਗ-ਸੰਗ ਰਹਿੰਦੇ ਹਾਂ। ਅਸੀਂ, ਸ਼ਹੀਦ ਭਗਤ ਸਿੰਘ ਹੋਰਾਂ ਦੇ ਸੁਪਨਿਆਂ ਦਾ ਰਾਜ ਤੇ ਸਮਾਜ ਸਿਰਜਣ ਲਈ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਜਾਗਰਿਤ ਤੇ ਜਥੇਬੰਦ ਹੋ ਕੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਰਨ ਦਾ ਹੋਕਾ ਦਿੰਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਾਂ। ਸਾਡਾ ਨਿਸ਼ਾਨਾ ਹੈ - ਮੁਲਕ (ਸਾਮਰਾਜੀ-ਸਹਾਇਤਾ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ) ਖੁਦ ਵਿਕਾਸ ਕਰੇ। ਕਾਰੋਬਾਰ ਤਰੱਕੀ ਕਰਨ। ਲੋਕ ਖੁਸ਼ਹਾਲ ਹੋਣ। ਸਭਨਾਂ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਜਿਉਣ, ਖਾਣ, ਪਹਿਨਣ, ਵਸਣ, ਪੜ•ਨ ਤੇ ਅੱਗੇ ਵਧਣ ਦਾ ਬਰਾਬਰ ਮੌਕਾ ਮਿਲੇ। ਮੁਲਕ ਅੰਦਰ ਅਸਲੀ ਆਜ਼ਾਦੀ ਤੇ ਸੱਚੀ ਜਮਹੂਰੀਅਤ ਹੋਵੇ।  ਜਿਹੜੇ ਲੋਕ-ਹਿੱਸੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਅਸੀਂ ਉਨ•ਾਂ ਦੀਆਂ ਮੰਗਾਂ ਤੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਦਾ ਹੋਰਨਾਂ ਲੋਕ-ਹਿੱਸਿਆਂ ਅੰਦਰ ਪ੍ਰਚਾਰ ਲੈ ਕੇ ਜਾਂਦੇ ਹਾਂ ਤੇ ਉਨ•ਾਂ ਨੂੰ ਉਸ ਸੰਘਰਸ਼ ਦੀ ਹਮਾਇਤ ਕਰਨ ਲਈ ਪਰੇਰਦੇ ਹਾਂ। ਇਉਂ ਅਸੀਂ, ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਲੋਕ-ਦੋਖੀ ਫੈਸਲਿਆਂ-ਨੀਤੀਆਂ-ਅਮਲਾਂ ਤੋਂ ਪੀੜਤ ਤੇ ਸੰਘਰਸ਼ਸ਼ੀਲ ਸਭਨਾਂ ਲੋਕ-ਹਿੱਸਿਆਂ ਦੀ ਜੋਟੀ ਪਵਾਉਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਾਂ।

ਲੋਕਾਂ ਨਾਲ ਵੈਰ - ਜੋਕਾਂ ਨਾਲ ਦੋਸਤੀ
ਕੇਂਦਰ ਦੀ ਕਾਂਗਰਸੀ-ਸਰਕਾਰ ਨੇ, ਮੁਲਕ ਦੇ 9000 ਅਰਬ ਰੁਪਏ ਸਲਾਨਾ ਦੇ ਇਸ ਪ੍ਰਚੂਨ-ਕਾਰੋਬਾਰ ਨੂੰ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਲੁਟੇਰਿਆਂ ਦੀ ਝੋਲੀ ਪਾਉਣ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਕਰਕੇ ਮੁਲਕ ਤੇ ਲੋਕਾਂ ਨਾਲ ਦਗਾ ਕਮਾ ਲਿਆ ਹੈ ਤੇ ਸਾਮਰਾਜੀ-ਲੁਟੇਰਿਆਂ ਨਾਲ ਵਫਾ ਪਾਲ ਲਈ ਹੈ। ਵਾਲ-ਮਾਰਟ ਵਰਗੀਆਂ ਦਿਓ-ਕੰਪਨੀਆਂ ਨੂੰ ਸੱਦਾ ਦੇ ਕੇ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਸਾਮਰਾਜ-ਭਗਤੀ ਤੇ ਚਾਕਰੀ ਦਾ ਸਬੂਤ ਦੇ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਇਹ ਫੈਸਲਾ, ਮੁਲਕ ਦਾ ਕਾਰੋਬਾਰ ਉਜਾੜੇਗਾ। ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਧਨ-ਕੁਬੇਰਾਂ ਦਾ ਇਸ ਕਾਰੋਬਾਰ 'ਤੇ ਕਬਜਾ ਕਰਵਾਏਗਾ। ਲਗਪਗ ਦਹਿ ਕਰੋੜ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਰੋਟੀ-ਰੋਜ਼ੀ ਖੋਹੇਗਾ। ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰੀ, ਗਰੀਬੀ ਤੇ ਭੁੱਖਮਰੀ ਵਧਾਏਗਾ।

ਇਹ ਫੈਸਲਾ, ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਉਸ ਵੇਲੇ ਲਿਆ ਹੈ, ਜਦੋਂ ਇਨ•ਾਂ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਕੰਪਨੀਆਂ ਦੀ ਲੁੱਟ ਦੇ ਸਤਾਏ, ਦੁਨੀਆਂ ਭਰ ਦੇ 80-82 ਮੁਲਕਾਂ ਦੇ ਲੋਕ ਆਪੋ-ਆਪਣੇ ਮੁਲਕਾਂ 'ਚੋਂ ਇਨ•ਾਂ ਕੰਪਨੀਆਂ ਨੂੰ ਦਬੱਲ ਰਹੇ ਹਨ। ਇਨ•ਾਂ ਕੰਪਨੀਆਂ ਵੱਲੋਂ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਲੁੱਟ ਝੱਲਣ ਤੋਂ ਨਾਬਰ ਹੋ ਚੁੱਕੇ ਖੁਦ ਅਮੀਰ ਕਹੇ ਜਾਂਦੇ ਅਮਰੀਕਾ, ਇੰਗਲੈਂਡ, ਫਰਾਂਸ, ਜਰਮਨ, ਜਪਾਨ ਵਰਗੇ ਮੁਲਕਾਂ ਦੇ ਲੋਕ ਸੰਘਰਸ਼ ਦੇ ਰਾਹ ਪਏ ਹੋਏ ਹਨ। ਉਥੋਂ ਤੋਏ ਤੋਏ ਕਰਵਾ ਕੇ ਇਹ ਕੰਪਨੀਆਂ ਆਪਣੀ ਗੰਦੀ ਬੂਥੀ ਹੁਣ ਇਥੇ ਘੁਸੋੜ ਰਹੀਆਂ ਹਨ। ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਸਭ ਦਰਵਾਜੇ ਇਨ•ਾਂ ਲਈ ਚੌਪਟ ਖੋਹਲ ਦਿੱਤੇ ਹਨ। ਕੋਈ ਰੋਕ-ਰੁਕਾਵਟ ਨਹੀਂ ਰਹਿਣ ਦਿੱਤੀ। ਇਹ ਫੈਸਲਾ, ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਕਿਸੇ ਅਣਜਾਣਪੁਣੇ ਜਾਂ ਭਰਮ-ਭੁਲੇਖੇ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ। ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਵਿਰੋਧ ਅਤੇ ਸ਼ਰੀਕਾਂ ਦੇ ਧਮੱਚੜ ਤੋਂ ਬੇਝਿਜਕ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ ਸਿਰ ਚੜਿ•ਆ ਸਾਮਰਾਜੀ-ਚਾਕਰੀ ਦਾ 'ਜਜਬਾ' ਹੀ ਬੋਲ ਰਿਹਾ ਹੈ, ''ਫੈਸਲਾ, ਬੜਾ ਸੋਚ-ਵਿਚਾਰ ਕੇ ਲਿਆ ਹੈ।''
 
ਸਰਕਾਰੀ ਦਲੀਲਾਂ ਦਾ ਥੋਥ
ਸਰਕਾਰ ਦਾ, ''ਇਹ ਫੈਸਲਾ ਮੁਲਕ ਦਾ ਵਿਕਾਸ ਕਰੇਗਾ'' ਨੂੰ ਕੋਈ ਕਿਵੇਂ ਸਹੀ ਮੰਨੇ, ਜਦੋਂਕਿ ਸਰਕਾਰ ਵੱਲੋਂ ਹਰ ਰੋਜ਼ 1947 ਤੋਂ ਹੁਣ ਤੱਕ ਕੀਤੇ 'ਵਿਕਾਸ' ਦੀ ਪਿੱਟੀ ਜਾ ਰਹੀ ਡੌਂਡੀ ਦਾ ਹਸ਼ਰ ਜੱਗ ਜਾਹਰ ਹੈ। ਮੁਲਕ ਦੇ 80 ਪ੍ਰਤੀਸ਼ਤ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਰੋਜ਼ ਦੀ ਔਸਤ ਕਮਾਈ 11 ਰੁਪਏ ਤੋਂ 17 ਰੁਪਏ ਹੈ। ਦੋ ਡੰਗ ਦੀ ਰੋਟੀ-ਦਾਲ ਨਹੀਂ ਜੁੜਦੀ। 45 ਪ੍ਰਤੀਸ਼ਤ ਕੋਲ ਸਿਰ ਢਕਣ ਲਈ ਆਵਦਾ ਮਕਾਨ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਕੈਂਸਰ, ਸਾਹ-ਦਮੇ ਤੇ ਦਿਲ ਦੀਆਂ ਨਾਮੁਰਾਦ ਬਿਮਾਰੀਆਂ ਦੇ ਜਕੜ-ਪੰਜੇ 'ਚ ਛਟਪਟਾ ਰਹੀ ਵੱਡੀ ਗਿਣਤੀ ਲੋਕਾਂ ਕੋਲ ਸਿਹਤ ਸਹੂਲਤਾਂ ਲੈਣ ਲਈ ਕਾਣੀ-ਕੌਡੀ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਮਹਿੰਗਾਈ, ਬੇਰੁਜ਼ਗਾਰੀ ਤੇ ਗਰੀਬੀ ਵਧ ਰਹੀ ਹੈ। ਖੁਦਕੁਸ਼ੀਆਂ ਵਧ ਰਹੀਆਂ ਹਨ।  

ਕੇਂਦਰੀ ਵਣਜ ਮੰਤਰੀ, ਇਸ ਫੈਸਲੇ ਦੇ ਅਮਲ 'ਚ ਆਉਣ ਨਾਲ ਇਕ ਕਰੋੜ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਦੇਣ ਦੀਆਂ ਟਾਹਰਾਂ ਆਸਰੇ ਉਹ ਖੁਦ ਸਾਮਰਾਜੀ-ਚਾਕਰੀ ਕਰਨ ਅਤੇ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਇਸ ਪ੍ਰਚੂਨ-ਕਾਰੋਬਾਰ 'ਚ ਲੱਗੇ ਲਗਪਗ ਦਹਿ ਕਰੋੜ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਇਸ ਫੈਸਲੇ ਨਾਲ ਹੋਣ ਵਾਲੇ ਉਖੇੜੇ ਤੇ ਉਜਾੜੇ ਦੇ ਕੁਕਰਮ ਨੂੰ ਢਕਣ ਦੀ ਨਾਕਾਮ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਮੀਡੀਏ ਵੱਲੋਂ ਫੜੇ ਜਾਣ 'ਤੇ ਖੁਦ ਸ਼ਰਮਿੰਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।

1947 ਤੋਂ ਹੁਣ ਤੱਕ ਮੁਲਕ ਅੰਦਰ ਵਿਦੇਸ਼ੀ-ਪੂੰਜੀ ਤੇ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਦਖਲ ਦਾ ਅਮਲ ਸਰਕਾਰ ਦੀਆਂ ਸਭ ਦਲੀਲਾਂ ਦਾ ਸੱਚ ਸਾਹਮਣੇ ਲਿਆਉਂਦਾ ਹੈ। ਹੁਣੇ ਹੁਣੇ ਬੈਂਕਾਂ ਤੇ ਬੀਮਾ ਖੇਤਰ ਵਿਚ ਦਾਖਲ ਹੋਏ ਵਿਦੇਸ਼ੀ-ਦਖਲ ਦੇ ਰੰਗਾਂ ਦੀ ਵੈਂਗਣੀ ਉਘੜ ਚੁੱਕੀ ਹੈ। ਲੋਕ-ਸਹੂਲਤਾਂ ਛਾਂਗੀਆਂ ਗਈਆਂ ਹਨ। ਭਰਤੀ 'ਤੇ ਪਾਬੰਦੀ ਜੜ ਦਿੱਤੀ ਹੈ। ਮੁਲਾਜ਼ਮਾਂ 'ਤੇ ਕੰਮ-ਭਾਰ ਵਧਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਪੇਮੈਂਟਾਂ ਬਾਰੇ ਅਨਿਸ਼ਚਿਤਾ ਤੇ ਡਰ ਪੈਦਾ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਹੈ।

ਰਾਜ ਪ੍ਰਬੰਧ ਦੀ ਨੀਂਹ 'ਚ ¸ ਸਾਮਰਾਜੀ-ਚਾਕਰੀ ਦਾ ਮਸਾਲਾ
ਸਾਮਰਾਜੀ-ਚਾਕਰੀ ਦਾ 'ਜਜ਼ਬਾ' ਸਿਰਫ਼ ਇਸ ਸਰਕਾਰ ਸਿਰ ਹੀ ਨਹੀਂ ਚੜਿਆ ਹੋਇਆ। ਇਹ 1947 ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਬਣੀਆਂ ਸਭ ਸਰਕਾਰਾਂ ਤੇ ਇਨ•ਾਂ ਸਰਕਾਰਾਂ ਵਾਲੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਦੇ ਢਿੱਡੋਂ-ਚਿੱਤੋਂ ਡੁੱਲ-ਡੁੱਲ ਪੈਂਦਾ ਆਮ ਦੇਖਿਆ ਜਾਂਦਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਸਰਕਾਰ ਚਾਹੇ ਕੇਂਦਰ ਦੀ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਸੂਬੇ ਦੀ, ਕਾਂਗਰਸ ਦੀ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਭਾਜਪਾ ਦੀ, ਇੱਕੋ ਪਾਰਟੀ ਦੀ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਸਾਂਝੇ ਮੋਰਚੇ ਦੀ, ਕਾਮਰੇਡ ਪਾਰਟੀ ਦੀ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਦਲਿਤ ਪਾਰਟੀ ਦੀ, ਧਾਰਮਿਕ ਪਾਰਟੀ ਦੀ ਹੋਵੇ ਜਾਂ ਖੇਤਰੀ ਪਾਰਟੀ ਦੀ ਸਭ ਸਾਮਰਾਜ ਦੇ, ਉਨ•ਾਂ ਦੀਆਂ ਨੀਤੀਆਂ ਦੇ ਢੰਡੋਰਚੀ ਹਨ। ਏਸੇ 'ਜਜਬੇ' ਦਾ ਜੋਰ ਹੈ ਕਿ ਨਿੱਤ ਦਿਨ ਕੇਂਦਰੀ ਸਰਕਾਰ ਵਿਰੁੱਧ ਜ਼ਹਿਰ ਉਗਲਣ ਵਾਲੀ ਅਕਾਲੀ ਪਾਰਟੀ, ਪੰਜਾਬ ਸਰਕਾਰ ਚਲਾਉਣ ਲਈ ਸਹਾਰਾ ਤੇ ਭਾਈਵਾਲ ਬਣੀ ਭਾਜਪਾ ਨੂੰ ਨਾਲ ਲਏ ਬਿਨਾਂ, ਇਸ ਫੈਸਲੇ ਸਮੇਂ ਕਾਂਗਰਸੀ-ਸਰਕਾਰ ਦੀ ਹਮੈਤ 'ਤੇ ਆ ਖੜੀ ਹੈ।

ਇਹ ਸਭ ਸਰਕਾਰਾਂ ਤੇ ਉਨ•ਾਂ ਦੀਆਂ ਪਾਰਟੀਆਂ ਗੁੰਮਰਾਹਕਰੂ ਦਲੀਲਾਂ ਸਹਾਰੇ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਪਤਿਆਉਣ ਤੇ ਚੁੰਧਿਆਉਣ ਲਈ ਕਦੇ ਉਹ ''ਚਮਕਦਾ ਭਾਰਤ'', ਕਦੇ  ''ਪ੍ਰਮਾਣੂ ਸ਼ਕਤੀ'' ਅਤੇ ਕਦੇ ''ਵਿਕਾਸ'' ਦੇ ਦਮਗਜੇ ਮਾਰਨ ਲੱਗੀਆਂ ਕੋਈ ਸੰਗ-ਸ਼ਰਮ ਮਹਿਸੂਸ ਨਹੀਂ ਕਰਦੀਆਂ। ਆਪਣੇ ਮੁਲਕ ਦਾ ਰਾਜਕੀ-ਢਾਂਚਾ ਹੀ ਇਹੋ ਜਿਹਾ ਹੈ। 1947 ਵਿਚ ਏਹਦੀ ਨੀਂਹ ਰੱਖਣ ਵਾਲਿਆਂ ਨੇ ਹੀ ਵਿਦੇਸ਼ੀ-ਲੁੱਟ ਨੂੰ ਖੁੱਲ• ਦੇਣ ਦੇ ਲਾਂਘੇ ਰੱਖ ਲਏ ਸਨ। ਲੋਕਾਂ ਅੰਦਰ ਬਰਤਾਨਵੀ-ਸਾਮਰਾਜ ਦੀ ਲੁੱਟ ਤੇ ਕੁੱਟ ਖਿਲਾਫ ਵਧੀ ਰਾਸ਼ਟਰੀ ਚੇਤਨਤਾ ਦੇ ਸਨਮੁੱਖ ਆਜ਼ਾਦੀ ਤੇ ਲੋਕ-ਭਲਾਈ ਦਾ ਛਲਾਵਾ ਖੇਡਿਆ ਗਿਆ ਸੀ। ਲੋਕ-ਰਾਜ ਤੇ ਵੋਟ-ਰਾਜ ਦੇ ਨਾਂ ਹੇਠ ਸਰਕਾਰ ਚੁਣਨ ਦਾ ਢਕਵੰਜ ਖੜਾ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਹੈ। ਸਾਮਰਾਜੀ ਲੋੜਾਂ ਅਨੁਸਾਰ ਨੀਤੀਆਂ-ਕਨੂੰਨ ਘੜੇ ਗਏ। ਸਾਮਰਾਜੀ-ਚਾਕਰੀ ਤੇ ਸਾਮਰਾਜੀ ਲੁੱਟ ਬਾਦਸਤੂਰ ਜਾਰੀ ਰੱਖੀ ਗਈ ਹੈ।

ਲੁੱਟ ਹੋਰ ਤੇਜ਼ ਕਰਨ ਹਿੱਤ 1990-91 ਵਿਚ ਸਾਮਰਾਜੀ-ਨਿਰਦੇਸ਼ਿਤ ¸ ਉਦਾਰੀਕਰਨ, ਸੰਸਾਰੀਕਰਨ ਤੇ ਨਿੱਜੀਕਰਨ ਦੀਆਂ ਨੀਤੀਆਂ ਘੜੀਆਂ ਗਈਆਂ ਤੇ ਮੁਲਕ ਅਤੇ ਲੋਕਾਂ ਸਿਰ ਮੜੀਆਂ ਗਈਆਂ। ਜਦੋਂ ਮੁਲਕ ਦੇ ਢਾਂਚੇ ਅੰਦਰ ਹੀ ਵਿਦੇਸ਼ੀ ਦਖਲ ਪ੍ਰਵਾਨ ਹੈ। ਜਦੋਂ ਨੀਤੀਆਂ-ਕਨੂੰਨ ਹੀ ਸਾਮਰਾਜ ਵੱਲੋਂ ਨਿਰਦੇਸ਼ਿਤ ਹਨ। ਫਿਰ ਸਰਕਾਰ ਕੋਈ ਵੀ ਬਣ ਜਾਵੇ, ਉਹਨੇ ਏਹੀ ਕਰਨਾ ਹੈ, ਜੋ ਹੁਣ ਵਾਲੀ ਸਰਕਾਰ ਕਰ ਰਹੀ ਹੈ। 2004 ਵਿਚ ਭਾਜਪਾ ਨੇ ਵੀ ਇਹ ਯਤਨ ਕੀਤਾ ਸੀ। ਹੁਣ ਅਕਾਲੀ ਪਾਰਟੀ ਵੀ ਇਹੀ ਕਰ ਰਹੀ ਹੈ। ਤੁਹਾਡੇ ਵਿਰੋਧ ਨੂੰ ਅਤੇ ਕਈ ਸੂਬਿਆਂ ਅੰਦਰ ਆ ਰਹੀਆਂ ਚੋਣਾਂ ਨੂੰ ਗਿਣਦਿਆਂ ਇਹ ਸਰਕਾਰ ਵੀ ਇਹ ਫੈਸਲਾ ਵਾਪਸ ਲੈ ਸਕਦੀ ਹੈ, ਪਰ ਸਾਮਰਾਜੀ ਚਾਕਰੀ ਦਾ 'ਜਜਬਾ' ਕੋਈ ਮੌਕਾ ਮਿਲਦਿਆਂ ਹੀ ਇਹ ਫੈਸਲਾ ਮੁੜ ਕਰਵਾਏਗਾ। ਇਹ ਇੱਕ-ਦੂਜੇ ਨੂੰ ਪਾਰਲੀਮੈਂਟ ਅੰਦਰ ਘੇਰਨ ਦਾ ਤਾਂ ਵਿਖਾਵਾ ਹੀ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਗੱਦੀ ਹਥਿਆਉਣ ਦੀ ਖੇਡ ਖੇਡਦੇ ਹਨ। ਵੋਟਾਂ ਵਟੋਰਨ ਦਾ ਛਲਾਵਾ ਕਰਦੇ ਹਨ।

'ਕੱਲੇ 'ਕੱਲੇ ਮਾਰ ਨਾ ਖਾਓ - 'ਕੱਠੇ ਹੋ ਕੇ ਅੱਗੇ ਆਓ
ਇਨ•ਾਂ ਤੋਂ ਝਾਕ ਛੱਡੋ। ਆਪਣਾ ਬਚਾਅ ਤਾਂ ਖੁਦ ਆਪ ਨੂੰ ਹੀ ਕਰਨਾ ਪੈਣਾ ਹੈ ਤੇ ਕਰਨਾ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਜਿਵੇਂ ਠੰਢ ਤੋਂ ਬਚਣ ਲਈ ਹਰ ਕੋਈ ਆਪਦਾ ਆਪਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਹੀ ਠੰਢ ਤੋਂ ਬਚਦਾ ਹੈ। ਏਸੇ ਤਰ•ਾਂ ਕਾਰੋਬਾਰ ਤੇ ਰੁਜ਼ਗਾਰ ਬਚਾਉਣ ਲਈ ਹਰ ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਖੁਦ ਉਪਾਅ ਕਰਨਾ ਪੈਣਾ ਹੈ। ਵਾਟ ਜਿੰਨੀ ਮਰਜੀ ਲੰਮੀ ਤੇ ਕਠਨ ਹੋਵੇ, ਆਵਦੇ ਤੁਰਿਆਂ ਹੀ ਮੁੱਕਦੀ ਹੈ।

ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਇਸ ਫੈਸਲੇ ਖਿਲਾਫ਼ ਤੁਸੀਂ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਇਕੱਲੇ ਨਾ ਸਮਝੋ। ਬਹੁਤ ਲੋਕ ਹਨ, ਜਿਹੜੇ ਸਰਕਾਰ ਦੇ ਇਸ ਫੈਸਲੇ ਤੇ ਇਹੋ ਜਿਹੇ ਹੋਰ ਫੈਸਲਿਆਂ, ਕਨੂੰਨਾਂ, ਨੀਤੀਆਂ ਤੋਂ ਔਖੇ ਹਨ ਤੇ ਜੂਝ ਰਹੇ ਹਨ। ਉਨ•ਾਂ ਨਾਲ ਜੋਟੀ ਪਾਓ।

ਜਿਵੇਂ ਹੁਣ ਸਰਕਾਰ ਪੂਰੀ ਤਰ•ਾਂ ਸਾਮਰਾਜੀ-ਸੇਵਾ ਵਿਚ ਜੁਟੀ ਹੋਈ ਹੈ ਤੇ ਉਨ•ਾਂ ਦੀਆਂ ਕੰਪਨੀਆਂ ਨੂੰ ਮੁਲਕ ਦੀ ਲੁੱਟ ਕਰਨ ਦੀ ਖੁੱਲ• ਦੇ ਰਹੀ ਹੈ ਤਾਂ 1947 ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਵੀ ਮੁਲਕ ਦੇ ਰਾਜੇ-ਮਹਾਰਾਜੇ ਬਗਾਵਤਾਂ ਦਬਾਕੇ ਤੇ ਬਾਗੀਆਂ ਨੂੰ ਕੁਚਲ ਕੇ ਬਰਤਾਨਵੀ-ਸਾਮਰਾਜ ਦੀ ਸੇਵਾ ਵਿਚ ਲੱਗੇ ਹੋਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ ਵੀ ਲੋਕ-ਲਹਿਰ ਨੇ ਦੁਨੀਆਂ ਦੇ ਉਸ ਵੇਲੇ ਦੇ ਤਾਕਤਵਰ ਇਸ ਸਾਮਰਾਜੀ-ਦੈਂਤ ਨੂੰ ਇਥੋਂ ਭੱਜਣ ਲਈ ਮਜਬੂਰ ਕਰ ਦਿੱਤਾ ਸੀ। ਸੋ ਹੁਣ ਵਾਲੇ ਦੈਂਤ ਨੂੰ ਵੀ ਨੱਥ ਮਾਰੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਏਹਦੇ ਲਈ ਬੁੜ-ਬੁੜ ਨੂੰ ਬੋਲਾਂ ਵਿਚ ਬਦਲੋ। ਟੁੱਟਵੇਂ ਵਿਰੋਧ ਨੂੰ ਇੱਕਜੁੱਟ ਵਿਰੋਧ ਲਹਿਰ 'ਚ ਅੱਗੇ ਵਧਾਓ। ਸਾਰੇ ਲੁੱਟੇ ਜਾਣ ਵਾਲੇ ਲੋਕ (ਮੁਲਕ ਪੱਖੀ ਤੇ ਲੋਕ ਪੱਖੀ ਸਰਮਾਏਦਾਰ- ਸਨਅਤਕਾਰ, ਕਾਰੋਬਾਰੀ, ਵਰਕਰ, ਮੁਲਾਜ਼ਮ, ਨੌਜਵਾਨ-ਵਿਦਿਆਰਥੀਅ) ਮੁਲਕ ਦੀ ਆਬਾਦੀ ਦੀ ਵੱਡੀ ਗਿਣਤੀ, ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਧ ਲੁੱਟੇ-ਲਤਾੜੇ ਅਤੇ ਸਦਾ ਸੰਘਰਸ਼ਾਂ 'ਚ ਰਹਿਣ ਵਾਲੇ ਜੂਝਾਰੂ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ-ਕਿਸਾਨਾਂ ਨਾਲ ਪੱਕੀ ਜੋਟੀ ਪਾਓ। ਤਾਕਤ ਦਾ ਯੱਕ ਬੰਨੋ। ਲੋਕ-ਤਾਕਤ ਦਾ ਕਿਲਾ ਉਸਾਰੋ। ਸਾਮਰਾਜ ਤੇ ਉਸਦੇ ਸੇਵਾਦਾਰਾਂ ਦੀ ਲੁੱਟ ਤੇ ਕੁੱਟ ਤੋਂ ਆਜ਼ਾਦ ਖਰਾ ਜਮਹੂਰੀ ਰਾਜ ਉਸਾਰਨ ਦੇ ਸੰਘਰਸ਼ ਦਾ ਬਿਗਲ ਵਜਾਓ ਤੇ ਘੋਲ-ਅਖਾੜੇ ਭਖਾਓ।  

ਆਓ, ਇਕ ਦੂਜੇ ਨਾਲ ਵਿਚਾਰਾਂ ਕਰੀਏ। ਜੋਟੀਆਂ ਪਾਈਏ। ਏਹਦੇ ਲਈ, ਅੱਜ ਦੀਆਂ ਹਾਲਤਾਂ ਵਿਚ, ਲੋਕ ਮੋਰਚਾ ਇਕ ਪ੍ਰਚਾਰਕ ਤੇ ਇਕ ਪੁਲ ਦਾ ਕੰਮ ਕਰਨ ਲਈ ਤਿਆਰ ਹੈ। ਤੁਹਾਡੇ ਅੰਗ-ਸੰਗ ਹੈ।

ਵੱਲੋਂ : ਲੋਕ ਮੋਰਚਾ ਪੰਜਾਬ ਇਕਾਈ ਬਠਿੰਡਾ
ਪ੍ਰਧਾਨ : ਪੁਸ਼ਪ ਲਤਾ 9464073687                                                                                  www.lokmorcha.blogspot.com
ਸਕੱਤਰ : ਜਗਮੇਲ ਸਿੰਘ 94172-24822 (30.11.11) 

Tuesday, December 6, 2011

ਝੂਠੇ ਮੁਕਾਬਲਿਆਂ ਦਾ ਵਰਤਾਰਾ ਅਤੇ ਜਮਹੂਰੀ ਹੱਕ

ਕੌਮਾਂਤਰੀ ਮਨੁੱਖੀ ਅਧਿਕਾਰ ਦਿਹਾੜੇ ਮੌਕੇ

10 ਦਸੰਬਰ, 2011 ਨੂੰ

ਕਨਵੈਨਸ਼ਨ ਅਤੇ ਰੋਸ ਵਿਖਾਵਾ

ਵਿਸ਼ਾ: ਝੂਠੇ ਮੁਕਾਬਲਿਆਂ ਦਾ ਵਰਤਾਰਾ ਅਤੇ ਜਮਹੂਰੀ ਹੱਕ

ਪਿਆਰੇ ਦੋਸਤੋ,

ਤੁਹਾਨੂੰ ਪਤਾ ਹੈ ਕਿ ਪਿਛਲੇ ਦਿਨੀਂ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ (ਮਾਓਵਾਦੀ) ਪਾਰਟੀ ਦੇ ਚੋਟੀ ਦੇ ਆਗੂ ਕਾਮਰੇਡ ਕੋਟੇਸ਼ਵਰ ਰਾਓ ਕਿਸ਼ਨਜੀ ਨੂੰ ਮੁਕਾਬਲੇ ਦੀ ਘਿਸੀ-ਪਿਟੀ ਕਹਾਣੀ ਘੜਕੇ ਗੋਲੀਆਂ ਨਾਲ ਭੁੰਨਿਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਦੇਸ ਭਰ ਦੇ ਬੁੱਧੀਜੀਵੀ, ਜਮਹੂਰੀਅਤ ਅਤੇ ਇਨਸਾਫ-ਪਸੰਦ ਹਲਕੇ ਇਸਨੂੰ ਸਿਆਸੀ ਕਤਲ ਕਰਾਰ ਦਿੰਦੇ ਹੋਏ ਤਿੱਖਾ ਵਿਰੋਧ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ।

ਕਿਸ਼ਨਜੀ ਦੇ ਕਾਤਲਾਂ ਨੂੰ ਕਟਹਿਰੇ ‘ਚ ਖੜ੍ਹਾ ਕਰਨ ਲਈ ਮਿਲਕੇ ਪੰਜਾਬ ਭਰ 'ਚ ਵੀ ਜ਼ੋਰਦਾਰ ਅਵਾਜ਼ ਉਠਾਉਣ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ।

ਇਸ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਮੋਗਾ ਕਨਵੈਨਸ਼ਨ, ਉੱਘੇ ਲੋਕ ਕਵੀ ਅਤੇ ਰੰਗ ਕਰਮੀ ਜਤਿਨ ਮਰਾਂਡੀ (ਝਾਰਖੰਡ) ਦੀ ਫਾਂਸੀ ਦੀ ਸਜ਼ਾ ਰੱਦ ਕਰਵਾਉਣ, ਇਰੋਮਾ ਸ਼ਰਮੀਲਾ (ਮਨੀਪੁਰ) ਵਲੋਂ 11 ਵਰ੍ਹਿਆ ਤੋਂ ਭੁੱਖ ਹੜਤਾਲ ਕਰਕੇ ਰੱਖੀਆਂ ਮੰਗਾਂ ਪ੍ਰਵਾਨ ਕਰਵਾਉਣ ਲਈ ਅਵਾਜ਼ ਉਠਾਏਗੀ।

ਅਸੀਂ ਸਮੂਹ ਦੇਸ-ਭਗਤ, ਜਮਹੂਰੀ, ਇਨਕਲਾਬੀ, ਬੁੱਧੀਜੀਵੀ ਹਲਕਿਆਂ, ਤਰਕਸ਼ੀਲਾਂ, ਲੋਕ ਲਹਿਰ ਦੇ ਝੰਡਾ ਬਰਦਾਰਾਂ ਨੂੰ ਮੋਗਾ ਕਨਵੈਨਸ਼ਨ 'ਚ ਵਧ-ਚੜ੍ਹ ਕੇ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋਣ ਦੀ ਪੁਰਜ਼ੋਰ ਅਪੀਲ ਕਰਦੇ ਹਾਂ।


ਸਮਾਂ: 10 ਦਸੰਬਰ 2011 ਨੂੰ, 11 ਵਜੇ ਸਵੇਰੇ

ਸਥਾਨ: ਨਹਿਰੂ ਪਾਰਕ, ਮੋਗਾ ਵਿਖੇ


ਸੂਬਾ ਕਮੇਟੀ, ਅਪ੍ਰੇਸ਼ਨ ਗ੍ਰੀਨ ਹੰਟ ਵਿਰੋਧੀ ਜਮਹੂਰੀ ਫਰੰਟ (ਪੰਜਾਬ)
ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਕ - ਡਾ. ਪਰਮਿੰਦਰ ਸਿੰਘ, ਪ੍ਰੋ. ਏ. ਕੇ. ਮਲੇਰੀ, ਯਸ਼ਪਾਲ

Sunday, December 4, 2011

Fact Finding Report on Killing of Kishenji

ਕਿਸ਼ਨ ਜੀ ਦੀ ਹੱਤਿਆ ਬਾਰੇ ਜਮਹੂਰੀ ਹੱਕਾਂ ਦੀਆਂ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਵਲੋਂ ਜਾਰੀ ਪੜਤਾਲੀਆ ਰਿਪੋਰਟ

ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ.(ਮਾਓਵਾਦੀ) ਦੇ ਚੋਟੀ ਦੇ ਆਗੂ ਕਾ. ਕਿਸ਼ਨਜੀ ਦੇ ਮੁਕਾਬਲੇ 'ਚ ਮਾਰੇ ਜਾਣ ਦਾ ਝੂਠ ਨੰਗਾ ਹੋਣਾ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ। ਜਮਹੂਰੀ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ, ਲੋਕਪੱਖੀ ਬੁੱਧੀਜੀਵੀਆਂ ਅਤੇ ਨਿਰਪੱਖ ਪੱਤਰਕਾਰਾਂ ਵਲੋਂ ਕੀਤੀ ਗਈ ਜਾਂਚ ਤੋਂ ਇਹ ਸਪਸ਼ਟ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ ਕਿ ਕਾ. ਕਿਸ਼ਨਜੀ ਨੂੰ ਇਕ ਸੋਚੀ-ਸਮਝੀ ਵਿਉਂਤ ਤਹਿਤ ਗ੍ਰਿਫ਼ਤਾਰ ਕਰਕੇ ਹਿਰਾਸਤ 'ਚ ਭਾਰੀ ਤਸੀਹੇ ਦੇਣ ਪਿੱਛੋਂ ਕਤਲ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਇਹ ਸਿਆਸੀ ਕਤਲ ਉਸ ਸਮੇਂ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਜਦੋਂ ਮਾਓਵਾਦੀ ਪਾਰਟੀ ਨੇ ਪੱਛਮੀ ਬੰਗਾਲ 'ਚ ਜੰਗਬੰਦੀ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕੀਤਾ ਹੋਇਆ ਹੈ ਅਤੇ ਮਮਤਾ ਬੈਨਰਜੀ ਸਰਕਾਰ ਵੀ ਵਾਰ-ਵਾਰ ਬਿਆਨ ਦਿੰਦੀ ਰਹੀ ਹੈ ਕਿ ਮਾਓਵਾਦੀਆਂ ਖ਼ਿਲਾਫ਼ ਸੁਰੱਖਿਆ ਦਸਤਿਆਂ ਵਲੋਂ ਕੋਈ ਕਾਰਵਾਈ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ। ਪੰਜਾਬੀ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ ਇਸ ਸਿਆਸੀ ਕਤਲ ਦੀ ਅਸਲੀਅਤ ਤੋਂ ਜਾਣੂੰ ਕਰਾਉਣ ਲਈ 3 ਦਸੰਬਰ ਨੂੰ ਜਾਰੀ ਕੀਤੀ ਗਈ ਇਹ ਰਿਪੋਰਟ ਹੂ-ਬ-ਹੂ ਛਾਪੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ। (ਅਨੁਵਾਦ ਬੂਟਾ ਸਿੰਘ)

ਜਮਹੂਰੀ ਹੱਕਾਂ ਦੀਆਂ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਦੇ ਤਾਲਮੇਲ ਦਾ ਅੰਗ ਚਾਰ ਜਥੇਬੰਦੀਆਂ ਐਸੋਸੀਏਸ਼ਨ ਫਾਰ ਪ੍ਰੋਟੈਕਸ਼ਨ ਆਫ ਡੈਮੋਕਰੇਟਿਕ ਰਾਈਟਸ, ਆਂਧਰਾ ਪ੍ਰਦੇਸ਼ ਸਿਵਲ ਲਿਬਰਟੀ ਕਮੇਟੀ, ਬੰਦੀ ਮੁਕਤੀ ਕਮੇਟੀ ਅਤੇ ਪੀਪਲਜ਼ ਯੂਨੀਅਨ ਫਾਰ ਡੈਮੋਕਰੇਟਿਕ ਰਾਈਟਸ (ਦਿੱਲੀ) ਦੀ 22 ਮੈਂਬਰੀ ਟੀਮ ਨੇ ਪਹਿਲੀ ਦਸੰਬਰ 2011 ਨੂੰ ਮਲੋਜੁਲਾ ਕੋਟੇਸ਼ਵਰ ਰਾਓ (ਅੱਕਾ ਕਿਸ਼ਨਜੀ) ਦੇ ਪੁਲਿਸ ਮੁਕਾਬਲੇ 'ਚ ਮਾਰੇ ਜਾਣ ਦੀ ਪੜਤਾਲ ਕੀਤੀ। ਟੀਮ ਨੇ ਪੱਛਮੀ ਮੇਦਨੀਪੁਰ ਦੇ ਬੁਰੀਸੋਲ ਦੀ ਸੋਰਾਕਾਟਾ ਬਸਤੀ ਅਤੇ ਗੋਸਾਈਬੰਧ ਪਿੰਡ ਦਾ ਦੌਰਾ ਕੀਤਾ। ਟੀਮ ਨੇ ਦੋਵਾਂ ਪਿੰਡਾਂ ਦੇ ਵਸਨੀਕਾਂ, ਜੰਬੋਨੀ ਪੁਲਿਸ ਥਾਣੇ ਦੇ ਸਬ ਇੰਸਪੈਕਟਰ ਅਤੇ ਏ ਐੱਸ ਆਈ ਨਾਲ ਗੱਲ ਕੀਤੀ, ਅਤੇ ਉਸ ਥਾਂ ਦਾ ਦੌਰਾ ਕੀਤਾ ਜਿੱਥੇ 24 ਨਵੰਬਰ ਨੂੰ ਅਖੌਤੀ ਮੁਕਾਬਲਾ ਹੋਇਆ।

ਘਟਨਾ ਦੀ ਥਾਂ: ਜਿਸ ਥਾਂ ਤੋਂ ਕਿਸ਼ਨਜੀ ਦੀ ਲਾਸ਼ ਮਿਲੀ ਉਹ ਬੁਰੀਸੋਲ ਪਿੰਡ ਦੀ ਸੋਰਾਕਾਟਾ ਬਸਤੀ ਤੋਂ ਲਗਭਗ 300 ਮੀਟਰ 'ਤੇ ਹੈ। ਇਹ ਪਿੰਡ ਦੇ ਫੁੱਟਬਾਲ ਦੇ ਮੈਦਾਨ ਤੋਂ ਮੁਸ਼ਕਲ ਨਾਲ 50 ਕੁ ਮੀਟਰ ਦੂਰ ਹੈ ਅਤੇ ਸਾਲ ਦੇ ਰੁੱਖਾਂ ਹੇਠਾਂ ਢਕਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ। ਜਿੱਥੇ ਲਾਸ਼ ਜ਼ਮੀਨ 'ਤੇ ਡਿਗੀ ਮਿਲੀ ਸੀ ਉਸ ਦੇ ਨਾਲ ਸੱਜੇ ਪਾਸੇ ਸਿਉਂਕ ਦੀ ਵਰਮੀ ਹੈ। ਚਾਰ-ਚੁਫੇਰੇ ਵਿਰਲੇ-ਵਿਰਲੇ ਸਾਲ ਦੇ ਰੁੱਖ਼ ਹਨ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਤੋਂ ਇਕ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦੇ ਕਵਰ ਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵ ਪੈਂਦਾ ਹੈ। ਗੋਲੀਆਂ ਦੇ ਅਖੌਤੀ ਵਟਾਂਦਰੇ ਨਾਲ ਸਿਉਂਕ ਦੀ ਵਰਮੀ ਦਾ ਕੋਈ ਨੁਕਸਾਨ ਨਹੀਂ ਹੋਇਆ। ਜਿੱਥੇ ਜ਼ਮੀਨ ਉੱਪਰ ਲਾਸ਼ ਮਿਲੀ ਸੀ ਉੱਥੇ ਸਿਰ ਅਤੇ ਧੜ ਵਾਲੀ ਥਾਂ ਤਾਂ ਲਹੂ ਦਾ ਛੱਪੜ ਲੱਗਿਆ ਹੋਇਆ ਸੀ ਪਰ ਜਿਸ ਪਾਸੇ ਉਸ ਦੀਆਂ ਲੱਤਾਂ ਸਨ ਉੱਥੇ ਲਹੂ ਦਾ ਕੋਈ ਨਿਸ਼ਾਨ ਨਹੀਂ ਸੀ। ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਰੁੱਖਾਂ ਉੱਪਰ ਗੋਲੀਆਂ ਦੇ ਨਿਸ਼ਾਨ ਦੱਸੇ ਜਾ ਰਹੇ ਹਨ ਉੱਥੇ ਗੋਲੀਆਂ ਲੱਗਣ ਨਾਲ ਜਲਣ ਦੇ ਕੋਈ ਨਿਸ਼ਾਨ ਨਹੀਂ ਹਨ। ਅਸਲ ਵਿਚ ਮ੍ਰਿਤਕ ਦੀ ਬੁਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਨੁਕਸਾਨੀ ਹੋਈ ਲਾਸ਼ ਦੀ ਤੁਲਨਾ ਜੇ ਉਸ ਥਾਂ ਨਾਲ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇ (ਜਿੱਥੋਂ ਲਾਸ਼ ਮਿਲੀ) ਜਿੱਥੇ ਕੁਝ ਵੀ ਹਿੱਲਿਆ ਹੋਇਆ ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਇਸ ਤੋਂ ਕਾਫ਼ੀ ਸ਼ੱਕ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਜੇ ਉੱਥੇ ਗੋਲੀਆਂ ਦਾ ਭਾਰੀ ਅਦਾਨ-ਪ੍ਰਦਾਨ ਹੋਇਆ ਹੁੰਦਾ ਤਾਂ ਆਲੇ-ਦੁਆਲੇ ਇਸ ਨੂੰ ਦਰਸਾਉਂਦੇ ਨਿਸ਼ਾਨ ਜ਼ਰੂਰ ਹੁੰਦੇ। ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਧ ਸ਼ੱਕ ਇਸ ਤੋਂ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਜੇ ਉੱਥੇ ਗੋਲੀਆਂ ਦਾ ਵਟਾਂਦਰਾ ਹੋਇਆ ਅਤੇ ਇਸ ਥਾਂ ਗੋਲੀਆਂ ਸ਼ੂਕਦੀਆਂ ਲੰਘਦੀਆਂ ਰਹੀਆਂ ਤਾਂ ਲਾਸ਼ ਤੋਂ ਕੁਝ ਇੰਚ ਦੂਰ ਸਿਉਂਕ ਦੀ ਵਰਮੀ ਉੱਪਰ ਇਸ ਦਾ ਕੋਈ ਨਿਸ਼ਾਨ ਕਿਉਂ ਨਹੀਂ ਹੈ? ਸੁੱਕੇ ਪੱਤਿਆਂ ਉੱਪਰ ਗੋਲੀਬਾਰੀ ਦੀ ਅੱਗ ਦੀਆਂ ਚਿੰਗਾੜੀਆਂ ਨਾਲ ਜਲਣ ਦੇ ਕੋਈ ਨਿਸ਼ਾਨ ਨਹੀਂ ਹਨ। ਟੀਮ ਦੇ ਮੈਂਬਰਾਂ ਨੇ ਚਾਰ-ਚੁਫੇਰੇ ਤੁਰ-ਫਿਰਕੇ ਰੁੱਖ਼ਾਂ ਜਾਂ ਸਿਉਂਕ ਦੀ ਵਰਮੀ ਉੱਪਰ ਗੋਲੀਆਂ ਦੇ ਨਿਸ਼ਾਨ ਲੱਭਣ ਦੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕੀਤੀ। ਕੁਝ ਰੁੱਖਾਂ ਉੱਪਰ ਟੱਕ ਜ਼ਰੂਰ ਲੱਗੇ ਹੋਏ ਸਨ ਪਰ ਸਿਉਂਕ ਦੀ ਵਰਮੀ  ਨੂੰ ਕਿਤੇ ਕੋਈ ਨੁਕਸਾਨ ਨਹੀਂ ਪੁੱਜਿਆ ਹੋਇਆ ਅਤੇ ਰਾਈਫਲਾਂ ਅਤੇ ਮੌਰਟਰਾਂ ਦੀਆਂ ਭਾਰੀ ਗੋਲੀਬਾਰੀ ਨਾਲ ਸੜਨ ਦਾ ਇਕ ਵੀ ਨਿਸ਼ਾਨ ਉੱਥੇ ਨਹੀਂ ਮਿਲਿਆ!

ਪਿੰਡ ਦੇ ਵਸਨੀਕਾਂ ਵਲੋਂ ਦਿੱਤਾ ਵੇਰਵਾ: ਸੋਰਾਕਾਟਾ ਬਸਤੀ ਵਾਲਿਆਂ ਨੇ ਸਾਨੂੰ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਘਟਨਾ ਤੋਂ ਦੋ ਦਿਨ ਪਹਿਲਾਂ ਸੁਰੱਖਿਆ ਤਾਕਤਾਂ ਦੀ ਹਲਚਲ ਦੇਖਣ 'ਚ ਆਈ ਸੀ ਅਤੇ 24 ਨਵੰਬਰ ਨੂੰ ਇਹ ਇਕਦਮ ਵਧ ਗਈ ਜਦੋਂ ਸਵੇਰ ਨੂੰ 10-11 ਵਜੇ ਸੁਰੱਖਿਆ ਮੁਲਾਜ਼ਮਾਂ ਨੇ ਪਿੰਡ ਵਾਸੀਆਂ ਨੂੰ ਘਰਾਂ ਦੇ ਅੰਦਰ ਹੀ ਰਹਿਣ ਅਤੇ ਬਾਹਰ ਨਾ ਨਿਕਲਣ ਲਈ ਆਖਿਆ। ਪਿੰਡ ਵਾਲਿਆਂ ਅਨੁਸਾਰ, ਤਿੰਨ ਦਿਨ ਸੁਰੱਖਿਆ ਤਾਕਤਾਂ ਦੀ ਜ਼ੋਰਦਾਰ ਹਲਚਲ ਦੌਰਾਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਕੋਈ ਅਨਾਊਂਸਮੈਂਟ ਨਹੀਂ ਸੁਣੀ, ਕਿਸ਼ਨਜੀ ਨੂੰ ਆਤਮ-ਸਮਰਪਣ ਕਰ ਦੇਣ ਲਈ ਕਹਿਣ ਦੀ ਤਾਂ ਗੱਲ ਹੀ ਛੱਡੋ। 24 ਤਰੀਕ ਨੂੰ 4 ਤੋਂ 5 ਵਜੇ ਦਰਮਿਆਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਰੌਲਾ-ਰੱਪਾ ਸੁਣਿਆ ਜਿਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਲਗਭਗ 15 ਤੋਂ 30 ਮਿੰਟ ਗੋਲੀਆਂ ਚਲਦੀਆਂ ਰਹੀਆਂ। ਖ਼ਾਸ ਗੱਲ ਇਹ ਹੋਈ ਕਿ ਇਕ ਸਥਾਨਕ ਝੋਲਾਛਾਪ ਡਾਕਟਰ ਬੁਧੇਵ ਮਹਾਤੋ ਅਤੇ 20 ਕੁ ਸਾਲ ਦੇ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਤਾਰਾਚੰਦ ਟੁਡੂ ਨੂੰ ਚੁੱਕਕੇ 25/11/2011 ਦੇ ਕੇਸ ਨੰਬਰ 46/11 'ਚ ਫਸਾ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਅਤੇ ਭਾਰਤੀ ਦੰਡਾਵਲੀ ਦੀ ਧਾਰਾ 307 ਅਤੇ ਹੋਰ ਧਾਰਾਵਾਂ ਲਗਾ ਦਿੱਤੀਆਂ ਗਈਆਂ। ਬੁਰੀਸੋਲ ਤੋਂ ਪੰਜ ਕਿਲੋਮੀਟਰ ਦੂਰੀ 'ਤੇ ਵਸੇ ਪਿੰਡ ਗੋਸਾਈਬੰਧ ਤੋਂ ਧਰਮਿੰਦਰ ਨਾਂ ਦੇ ਲੜਕੇ, ਜੋ ਸਥਾਨਕ ਕਾਲਜ 'ਚ ਭੂਗੋਲ ਵਿਸ਼ੇ 'ਚ ਤੀਜੇ ਸਾਲ ਦਾ ਵਿਦਿਆਰਥੀ ਹੈ, ਨੂੰ ਪੁਲਿਸ ਨੇ ਕਿਸ਼ਨਜੀ ਨੂੰ ਸ਼ਰਣ ਦੇਣ ਦੇ ਝੂਠੇ ਇਲਜ਼ਾਮ 'ਚ ਚੁੱਕ ਲਿਆ ਅਤੇ ਉਸ ਤੋਂ ਲੈਪਟਾਪ ਬਰਾਮਦ ਹੋਣ ਦਾ ਦਾਅਵਾ ਕੀਤਾ। ਉਸ ਦੇ ਪਰਿਵਾਰ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਸੀ ਕਿ ਬੈਗ ਜ਼ਰੂਰ ਧਰਮਿੰਦਰ ਦਾ ਸੀ ਪਰ ਉਸ ਵਿਚ ਲੈਪਟਾਪ ਕੋਈ ਨਹੀਂ ਸੀ ਇਸ ਦੀ ਥਾਂ ਵੀਹ ਹਜ਼ਾਰ ਰੁਪਏ ਪੁਲਿਸ ਨੇ ਚੋਰੀ ਕਰ ਲਏ ਅਤੇ ਪਰਿਵਾਰ ਦਾ ਰਾਸ਼ਨ ਕਾਰਡ, ਸਰਟੀਫਿਕੇਟ ਅਤੇ ਓ. ਬੀ. ਸੀ ਦਾ ਕਾਰਡ ਵੀ ਚੁੱਕਕੇ ਲੈ ਗਏ।

ਪੁਲਿਸ ਥਾਣਾ ਜੰਬੋਨੀ: ਟੀਮ ਮੈਂਬਰਾਂ ਨੇ ਐੱਸ ਆਈ ਸਬਿਆਸਾਚੀ ਬੋਧਕ ਨਾਲ ਗੱਲਬਾਤ ਕੀਤੀ ਅਤੇ ਉਸਨੂੰ ਪੁੱਛਿਆ ਕਿ ਉਸ ਨੂੰ ਮੁਕਾਬਲੇ ਦੀ ਸੂਚਨਾ ਕਦੋਂ ਮਿਲੀ, ਸੂਚਨਾ ਕਿਸ ਨੇ ਦਿੱਤੀ ਅਤੇ ਐੱਫ ਆਈ ਆਰ ਕਿਸਨੇ ਲਿਖੀ ਕਿਉਂਕਿ ਘਟਨਾ ਉਸ ਦੇ ਅਧਿਕਾਰ-ਖੇਤਰ 'ਚ ਹੋਈ ਸੀ। ਇਨ੍ਹਾਂ ਅਧਿਕਾਰੀਆਂ ਮੁਤਾਬਿਕ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਇਸ ਦੀ ਸੂਚਨਾ ਰਾਤ ਨੂੰ ਸਾਢੇ ਦਸ ਵਜੇ ਜੰਗਲਮਹੱਲ ਦੇ ਵਧੀਕ ਐੱਸ ਪੀ ਅਲੋਕਨਾਥ ਰਾਜੋਰੀ ਤੋਂ ਮਿਲੀ ਸੀ। ਅਤੇ ਇਸੇ ਵਧੀਕ ਐੱਸ ਪੀ ਨੇ ਐੱਫ ਆਈ ਆਰ ਲਿਖੀ ਸੀ। ਇਹ ਨੋਟ ਕਰਨ ਵਾਲੀ ਗੱਲ ਹੈ ਕਿ ਇਸ ਦੀ ਜਾਂਚ ਦਾ ਕੰਮ ਕਰਾਈਮ ਬਰਾਂਚ-ਸੀ ਆਈ ਡੀ ਦੇ ਡੀ ਐੱਸ ਪੀ ਨੂੰ ਸੌਂਪਿਆ ਗਿਆ ਹੈ ਜਦਕਿ ਰਪਟ ਦਰਜ ਕਰਨ ਵਾਲਾ ਸੀਨੀਅਰ ਅਧਿਕਾਰੀ ਹੈ। ਇਹ ਕੁਦਰਤੀ ਨਿਆਂ ਦੇ ਮੂਲ ਸਿਧਾਂਤ ਦੀ ਹੀ ਉਲੰਘਣਾ ਹੈ ਕਿ ਇਕ ਜੂਨੀਅਰ ਅਫ਼ਸਰ ਰਪਟ ਦਰਜ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਸੀਨੀਅਰ ਅਫ਼ਸਰ ਦੇ ਜੁਰਮ ਦੀ ਜਾਂਚ ਕਰੇ। ਅਸੀਂ ਇਹ ਲਾਜ਼ਮੀ ਧਿਆਨ 'ਚ ਲਿਆਉਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਕਿਸ਼ਨਜੀ ਦੇ ਸਰੀਰ 'ਤੇ ਜ਼ਖ਼ਮ ਕਿਹੋ ਜਹੇ ਸਨ। ਸਰੀਰ ਉੱਪਰ ਗੋਲੀ ਦੇ ਜ਼ਖ਼ਮ, ਤੇਜ਼ਧਾਰ ਨਾਲ ਲੱਗੇ ਟੱਕ ਅਤੇ ਜਲਣ ਦੇ ਨਿਸ਼ਾਨ ਸਨ। ਹੈਰਾਨੀ ਦੀ ਗੱਲ ਇਹ ਸੀ ਕਿ ਉਸ ਦੀ ਕਮੀਜ਼ ਅਤੇ ਪੈਂਟ ਉੱਪਰ ਇਹੋ ਜਹੇ ਕੋਈ ਨਿਸ਼ਾਨ ਨਹੀਂ ਸਨ। 
  • ਸਿਰ ਉੱਪਰ ਜ਼ਖ਼ਮ : ਸੱਜੀ ਅੱਖ ਦਾ ਡੇਲਾ ਬਾਹਰ ਲਟਕਿਆ ਹੋਇਆ ਸੀ। ਜਬਾੜ੍ਹੇ ਦਾ ਹੇਠਲਾ ਹਿੱਸਾ ਗਾਇਬ ਸੀ ਇਸ ਦੀ ਥਾਂ ਜਲਣ ਦੇ ਨਿਸ਼ਾਨ ਪਏ ਹੋਏ ਸਨ। ਸਿਰ ਦੇ ਪਿਛਲੇ ਪਾਸੇ ਖੋਪੜੀ ਦਾ ਇਕ ਹਿੱਸਾ ਗਾਇਬ ਸੀ। ਚਿਹਰੇ ਉੱਪਰ ਚਾਰ ਥਾਵਾਂ 'ਤੇ ਸੰਗੀਨ ਨਾਲ ਵਿੰਨੇ ਜਾਣ ਵਰਗੇ ਨਿਸ਼ਾਨ ਸਨ। ਗਰਦਣ ਦੇ ਤੀਜੇ ਹਿੱਸੇ ਉੱਪਰ ਤਿਰਛਾ ਜ਼ਖ਼ਮ ਸੀ। 
  • ਸੱਜੀ ਬਾਂਹ ਦੇ ਅਗਲੇ ਹਿੱਸੇ ਦੀ ਹੱਡੀ ਟੁੱਟੀ ਹੋਈ ਸੀ ਜਦਕਿ ਚਮੜੀ ਉੱਪਰ ਕੋਈ ਬਾਹਰੀ ਜ਼ਖ਼ਮ ਨਹੀਂ ਸੀ।
  • ਸੱਜੀ ਬਾਂਹ ਉੱਪਰ ਗੋਲੀਆਂ ਦੇ  ਤਿੰਨ ਨਿਸ਼ਾਨ ਸਨ। ਦੋਵੇਂ ਗਿੱਟੇ ਟੁੱਟੇ ਹੋਏ ਸਨ ਅਤੇ ਖੱਬਾ ਪੈਰ ਅੱਧਾ ਲਮਕ ਰਿਹਾ ਸੀ। ਸੱਜੇ ਪੈਰ ਦੀ ਤਲੀ ਦੀ ਚਮੜੀ ਗਾਇਬ ਸੀ ਤੇ ਸੜੀ ਹੋਈ ਸੀ। ਖੱਬੇ ਹੱਥ ਦੀ ਵਿਚਕਾਰਲੀ ਉਂਗਲੀ ਦਾ ਤੀਜਾ ਹਿੱਸਾ ਗਾਇਬ ਸੀ। ਸਰੀਰ ਦੇ ਅਗਲੇ ਪਾਸੇ ਸੰਗੀਨ ਖੋਭੇ ਜਾਣ ਵਰਗੇ 30 ਟੱਕ ਲੱਗੇ ਹੋਏ ਸਨ। ਸਾਨੂੰ ਕਾਰਜਕਾਰੀ ਮੈਜਿਸਟ੍ਰੇਟ ਵਲੋਂ ਤਿਆਰ ਕੀਤੀ ਅਦਾਲਤੀ ਜਾਂਚ ਦੀ ਰਿਪੋਰਟ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਨਾ ਹੀ ਪੋਸਟਮਾਰਟਮ ਦੀ ਰਿਪੋਰਟ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਫਿਰ ਵੀ ਟੀਮ ਦੇ ਮੈਂਬਰਾਂ ਨੇ ਇਸ ਨੂੰ ਪੜ੍ਹਕੇ ਨੋਟ ਲੈ ਲਏ। ਹੈਰਾਨੀ ਦੀ ਗੱਲ ਇਹ ਸੀ ਕਿ ਰਿਪੋਰਟ ਵਿਚ ਗੋਲੀ ਲੱਗਣ ਅਤੇ ਗੋਲੀ ਬਾਹਰ ਨਿਕਲਣ ਦੇ ਜ਼ਖ਼ਮਾਂ ਨੂੰ ਛੱਡਕੇ ਉਪਰੋਕਤ ਕੋਈ ਵੀ ਜ਼ਖ਼ਮ ਦਰਜ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ।
ਅਸੀਂ ਇਸ ਨਤੀਜੇ 'ਤੇ ਪਹੁੰਚੇ: ਸਰੀਰ ਨੂੰ ਪਹੁੰਚੇ ਨੁਕਸਾਨ ਦੇ ਮੁਕਾਬਲੇ ਆਲੇ-ਦੁਆਲੇ ਦੀ ਥਾਂ ਆਮ ਵਾਂਗ ਸੀ। ਇਸਨੂੰ ਦੇਖਦੇ ਹੋਏ ਸਰਕਾਰੀ ਪੱਖ ਬਾਰੇ ਸ਼ੱਕ ਖੜ੍ਹੇ ਹੁੰਦੇ ਹਨ। ਜੋ ਸਰਕਾਰੀ ਪੱਖ ਪੇਸ਼ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਉਸ ਵਿਚ ਇਕਸੁਰਤਾ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਮਿਸਾਲ ਵਜੋਂ, ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਮਮਤਾ ਬੈਨਰਜੀ ਨੇ ਦਾਅਵਾ ਕੀਤਾ ਕਿ ਕਿਸ਼ਨਜੀ ਅਤੇ ਉਸਦੇ ਸਾਥੀ ਤਿੰਨ ਦਿਨ ਘਿਰੇ ਰਹੇ ਅਤੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਆਤਮ-ਸਮਰਪਣ ਕਰਨ ਲਈ ਕਿਹਾ ਗਿਆ, ਪਰ ਪਿੰਡ ਦੇ ਵਾਸੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਲਾਊਡ ਸਪੀਕਰ ਉੱਪਰ ਕਿਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਦਾ ਕੋਈ ਐਲਾਨ ਨਹੀਂ ਸੁਣਿਆ, ਆਤਮ-ਸਮਰਪਣ ਲਈ ਕਹਿਣ ਦੀ ਤਾਂ ਗੱਲ ਹੀ ਛੱਡੋ। ਸੀ ਆਰ ਪੀ ਐੱਫ ਦੇ ਡਾਇਰੈਕਟਰ ਜਨਰਲ ਸ੍ਰੀ ਵਿਜੇ ਕੁਮਾਰ ਨੇ 25 ਨਵੰਬਰ ਨੂੰ ਬਿਆਨ ਦਿੱਤਾ ਕਿ ਕਿਸ਼ਨਜੀ ਤਿੰਨ ਹੋਰ ਸਾਥੀਆਂ ਸਮੇਤ ਮੁਕਾਬਲੇ 'ਚ ਮਾਰਿਆ ਗਿਆ ਜਦਕਿ ਲਾਸ਼ ਸਿਰਫ਼ ਇਕ ਹੀ ਮਿਲੀ! ਇਹ ਕਿਹਾ ਗਿਆ ਕਿ 15 ਤੋਂ 30 ਮਿੰਟ ਤੱਕ ਚੱਲੇ ਮੁਕਾਬਲੇ ਦੌਰਾਨ ਕਈ ਸੌ ਗੋਲੀਆਂ ਚੱਲੀਆਂ, ਇਹ ਗਿਣਤੀ ਉਸ ਥਾਂ ਦੀ ਹਾਲਤ ਨਾਲ ਮੇਲ ਨਹੀਂ ਖਾਂਦੀ ਜਿੱਥੋਂ ਲਾਸ਼ ਮਿਲੀ। ਕਿਸ਼ਨਜੀ ਦੀ ਹੱਤਿਆ ਪੱਛਮੀ ਬੰਗਾਲ ਦੀ ਸਰਕਾਰ ਅਤੇ ਸੀ ਪੀ ਆਈ (ਮਾਓਵਾਦੀ) ਦਰਮਿਆਨ ਗੱਲਬਾਤ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰਨ ਦੀਆਂ ਮੁੱਢਲੀਆਂ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ਾਂ ਦੇ ਪਿਛੋਕੜ 'ਚ ਹੋਈ ਹੈ। ਉਸ ਦੀ ਮੌਤ ਨਾਲ ਇਨ੍ਹਾਂ ਯਤਨਾਂ ਨੂੰ ਭਾਰੀ ਧੱਕਾ ਲੱਗਾ ਹੈ। ਅਸੀਂ ਹੈਰਾਨ ਹਾਂ ਕਿ ਉਹੀ ਕੁਝ ਫਿਰ  ਦੁਹਰਾਇਆ ਗਿਆ ਹੈ ਜੋ ਲੰਘੇ ਸਾਲ 1-2 ਜੁਲਾਈ ਨੂੰ ਵਾਪਰਿਆ ਸੀ ਜਦੋਂ ਚੇਰੂਕੁਰੀ ਰਾਜਕੁਮਾਰ ਉਰਫ਼ ਆਜ਼ਾਦ ਨੂੰ ਝੂਠੇ ਮੁਕਾਬਲੇ 'ਚ ਮਾਰ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਸੀ। ਅਸੀ ਇਹ ਧਿਆਨ 'ਚ ਲਿਆਉਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਾਂ ਕਿ ਹਥਿਆਰਬੰਦ ਟਕਰਾਅ ਵਾਲੇ ਇਲਾਕੇ ਅੰਦਰ ਹੋਏ ਜੁਰਮ ਦੇ ਪ੍ਰਸੰਗ 'ਚ ਪ੍ਰਸਾਸ਼ਨ ਦੀ ਇਕ ਸ਼ਾਖਾ ਵਲੋਂ ਦੂਜੀ ਸ਼ਾਖਾ ਦੇ ਰਵੱਈਏ ਦੀ ਜਾਂਚ ਨਿਰਪੱਖ ਅਤੇ ਬਿਨਾ ਪੱਖਪਾਤ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦੀ। ਇਸ ਮਾਮਲੇ 'ਚ ਕ੍ਰਾਈਮ ਬਰਾਂਚ-ਸੀ ਆਈ ਡੀ ਨੂੰ ਸਾਂਝੇ ਸੁਰੱਖਿਆ ਦਸਤਿਆਂ ਦੀ ਭੂਮਿਕਾ ਦੀ ਜਾਂਚ ਦਾ ਕੰਮ ਸੌਂਪਿਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਸਾਡਾ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਹੈ ਕਿ ਸਿਰਫ਼ ਇਕ ਆਜ਼ਾਦਾਨਾ ਜਾਂਚ, ਭਾਵ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਜਾਂਚ ਟੀਮ, ਹੀ ਸੱਚ ਸਾਹਮਣੇ ਲਿਆ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਇਸ ਤੋਂ ਸਾਡੇ ਸ਼ੱਕ ਦੀ ਪੁਸ਼ਟੀ ਹੁੰਦੀ ਜਾਪਦੀ ਹੈ ਕਿ ਇਹ ਹਿਰਾਸਤ 'ਚ ਮੌਤ ਦਾ ਮਾਮਲਾ ਹੈ।

ਇਸ ਲਈ ਅਸੀਂ ਮੰਗ ਕਰਦੇ ਹਾਂ: 
  1. ਸੁਪਰੀਮ ਕੋਰਟ ਜਾਂ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਦੇ ਮੌਜੂਦਾ ਜਾਂ ਸੇਵਾਮੁਕਤ ਜੱਜ ਤੋਂ ਕਿਸ਼ਨਜੀ ਦੀ ਮੌਤ ਦੇ ਹਾਲਾਤਾਂ ਦੀ ਆਜ਼ਾਦਾਨਾ ਅਦਾਲਤੀ ਜਾਂਚ ਕਰਾਈ ਜਾਵੇ।
  2. ਭਾਰਤੀ ਦੰਡਾਵਲੀ ਦੀ ਦਫ਼ਾ 302 ਤਹਿਤ ਜੁਰਮ ਦਾ ਮੁਕੱਦਮਾ ਦਰਜ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ।
ਜਾਰੀ ਕਰਤਾ: ਦੇਬਾਪ੍ਰਸਾਦ ਰਾਏਚੌਧਰੀ (ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਏ ਪੀ ਡੀ ਆਰ), ਸੀ ਐੱਚ ਚੰਦਰਸ਼ੇਖਰ (ਜਨਰਲ ਸਕੱਤਰ ਏ ਪੀ ਸੀ ਐੱਲ ਸੀ), ਭਾਨੂ ਸਰਕਾਰ (ਸਕੱਤਰੇਤ ਮੈਂਬਰ ਬੀ ਐੱਮ ਐੱਸ), ਗੌਤਮ ਨਵਲੱਖਾ (ਮੈਂਬਰ ਪੀ ਯੂ ਡੀ ਆਰ)  

Published: ਸੂਬਾ ਕਮੇਟੀ, ਅਪ੍ਰੇਸ਼ਨ ਗ੍ਰੀਨ ਹੰਟ ਵਿਰੋਧੀ ਜਮਹੂਰੀ ਫਰੰਟ (ਪੰਜਾਬ)

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FACT FINDING REPORT BY COORDINATION OF DEMOCRATIC RIGHTS ORGANISATIONS ON THE KILLING OF CPI MAOIST LEADER KISHENJI



December 3, 2011 Fact Finding Report by Coordination of Democratic Rights Organisation

Twenty two member team of four constituents of Coordination of Democratic Rights Organisation namely Association for Protection of Democratic Rights, Andhra Pradesh Civil Liberties Committee, Bandi Mukti Committee and Peoples Union for Democratic Rights (Delhi) undertook a fact finding into the alleged encounter killing of Mallojula Koteswar Rao (aka Kishanji) on 1st December, 2011. The team visited Sorakatta hamlet of Burisole and Gosaibandh village of Paschim Mednipur. The team spoke to the residents of the two villages, the Sub Inspector and ASI of Jamboni Police Station, and visited the spot where the alleged encounter took place on 24th November.

SPOT: The place where Kishanji’s body was found is about 300 metres from the hamlet Sorakatta of Burisole village. It is barely 50 metres from the village football ground and surrounded by thin cover of Sal trees. Right next to where his body lay on the ground is a termite hill. All around is a thin spread of Sal trees giving the impression that of little cover. The termite hill remains undamaged by all the alleged exchange of fire. Where the body lay on the ground there is a pool of blood where his head and torso lay but no blood spot marks where his legs lay. The trees which ostensibly carry the bullet marks show no burn marks caused by bullets. Indeed the contrast between the badly damaged body of the deceased with the undisturbed spot where his body lay gives rise to much doubt. If there was heavy exchange of fire there would be telltale signs around. What is most intriguing is that the termite hill, barely few inches away from the body, shows no corresponding damage if there was an exchange of fire and bullets flying all around him. Dried leaves show no sign of burn caused by sparks from bullet fire. Team members walked around to see for themselves signs of bullet-marks on the trees or termite hills or other signs but whereas some tress had cutmarks not a single termite hill was damaged and no visible sign of burn or fire due to heavt rifle and mortar firing!

Villagers Account: At Sorakatta hamlet we were told that two days before the incident security forces movement became evident and it picked up by 24th November when in the morning, between 10-11 am, police personnel asked the villagers to stay inside their house and not to step out. According to the villagers during these three days of heavy security force movement no announcements were heard of any kind let alone of police asking Kisahnji to surrender. Between 4-5 pm of 24th they heard loud noise followed by sounds of bullet-fire for about 15-30 minutes. Significantly two villagers a local quack Budhev Mahato and Tarachand Tudu a 20 year old student were picked up and implicated in the same case no. 46/11 dated 25/11/2011 and charged under S 307 and other sections I.P.C.

At Gosaibandh, which is about 5 kms from Burisole, one Dharmendra, third year student of geography at a local college, was picked up for allegedly sheltering Kishanji and the police claimed to have seized a laptop. The family said that the bag belonged to Dharmendra and there was no laptop in it instead Rs20,000 was stolen and family’s ration card, certificates and OBC card were seized too.

Police Station Jamboni: The team members spoke to SI Sabyasachi Bodhak and asked him when did they receive information about the encounter, who informed them as well as who wrote the FIR since it fell in their jurisdiction. According to them they received the information from Additonal SP of Jangalmahal Aloknath Rajori at night at around 10.30 pm. And it is the Addl SP who wrote the FIR. It is important to note that the investigation has been entrusted to the DSP CB-CID whereas the complainant is a superior officer. This violates the basic principle of natural justice that a superior officer than the complainant officer investigate the crime.

We wish to recall the nature of injuries on the body of Kishanji. There were bullet, sharp cuts and burn injuries. Surprisingly there was no injury marks on his shirt and pant corresponding to his body parts.
  1. Injuries on Head:Right eye was hanging from the socket. Lower Jaw was missing instead there were burn marks. On the back side of the head part of skull brain missing. At four places on the face there was bayonet like stab marks. One third of the throat was had been slash wound.
  2. Right Fore Arm Bone was broken without the skin showing any external injury.
  3. The right Arm has three Bullet Injury Marks.
  4. On both legs ankles are broken and the left feet was half dangling.
  5. The left sole skin was missing and burnt.
  6. One third of the left hand index finger was removed.
  7. There were more than 30 Bayonet like cut injuries on front of the body. 

We were unable to get the Inquest Report prepared by the Executive Magistrate nor could we get the Postmortem report although team members have read and taken notes from it. Surprisingly none of the above injuries were recorded except the bullet entry and exit injuries. 

Our observations: Considering the extent of the damage caused to the body against the rather undisturbed surrounding of the spot where the body lay raises our suspicion about the official version. The reported official version themselves suffer from inconsistencies. For eg. Whereas Chief Minister Mamta Bannerjee claimed that for three days a Kishanji and his companions were encircled and they were asked to surrender, but the villagers deny having heard any public announcerment over loud speaker of any kind much less asking him to surrender. Mr Vijay Kumar DG of CRPF went on record on 25th November that Kishanji along with three others were killed in an encounter whereas only a single body was found! The reported number of bullets fired said to be several hundred in the course of 15-30 minute long encounter do not correspond to the spot where his body lay. 

The killing of Kishanji took place against the background of fledgling efforts to initiate talks between the state Government of West Bengal and the CPI(Maoist). With his death these efforts have been dealt a fatal blow. We cannot but wonder if this is a repeat of what transpired last year on July 1-2 when Cherukuri Rajkumar @Azad was killed in a fake encounter.

We wish to point out that in the context of a crime committed in the area affected by armed conflict investigation by one branch of the administration into the conduct of another branch, in this case CB-CID investigating the role of joint forces can not be considered impartial and unbiased. We, believe that only an independent investigation for eg by an SIT can help unravel the truth.

This tends to confirm our suspicion that this appears to be a case of custodial killing. Therefore, we demand: 
  1. An independent judicial inquiry headed by a sitting or retired Supreme Court or High Court judge into circumstances surrounding Kishanji’s death.
  2. Register a criminal case under section 302 I.P.C 
Debaprasad Roychoudhury (general secretary APDR) C H Chandrashekhar (general secretary APCLC) Bhanu Sarkar (secretariat member BMS) Gautam Navlakha (member PUDR) 

 Published & Circulated by: DEMOCRATIC FRONT AGAINST OPERATION GREEN HUNT, PUNJAB

Wednesday, November 30, 2011

बातचीत की संभावनाओं का एन्काउंटर है ये

बातचीत की संभावनाओं का एन्काउंटर है ये
written by amalendu on November 28th, 2011













सरकारी दावा इसे एन्काउंटर कहता है. सच मगर कुछ और कहता है. सच यह है कि देश में शायद ही कोई व्यक्ति एनकाउंटर में मारा जाता है. एन्काउंटर कोल्ड ब्लडड मर्डर का सरकारी वर्जन है. फिर, किशनजी जैसे माओवादी नेता के बारे में तो यह संदेह और भी गहरा जाता है जब परिजन और समर्थक सच की तस्वीरें सामने रख देते हैं.

 पुलिस का दावा कहता है कि माओवादी नेता कोटेश्वर राव यानी किशनजी गुरुवार को पश्चिम बंगाल में बॉरीशाल के जंगल में एक पुलिस मुठभेड़ में मारे गए. पोस्टमार्टम की रिपोर्ट कहती है कि एक गोली 500 मीटर की दूरी से लगी है. शरीर में छह गोलियां लगी हैं जो कि सभी महत्वपूर्ण हिस्सों में लगी हैं. जबड़ा, सिर, सीना गोलियों से छलनी कर दिया गया है.

पर परिवार के सदस्य, उनकी मां और भतीजी से सीधे आरोप लगाए हैं कि यह फ़र्जी मुठभेड़ का मामला है. परिजन और क्रांतिकारी कवि वरवरा राव इसे हत्या करार दे रहे हैं. उनका कहना है कि किशनजी को पुलिस ने पकड़कर, यातनाएं देकर मारा है. यह मामला पुलिस हिरासत में हत्या का है, न कि एन्काउंटर का. पोस्टमार्टम के दौरान परिजनों ने कुछ तस्वीरें भी खींची हैं जो साफ साफ दर्शाती हैं कि शरीर पर कितने और कैसे ज़ख्म हैं. यह प्रताड़ना और बर्बरता पूर्वक हत्या की चुगली करते हैं.

इस कथित एन्काउंटर को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं जिनका जवाब न तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट के पास है और न ही मुठभेड़ में शामिल रहे सुरक्षाकर्मियों के पास.

मसलन, एकाउंटर में ऐसा क्यों होता है कि गोलियां एकदम सटीक निशानों पर पहुंचती है. जिससे बचने की कोई गुंजाइश न रहे. किशन जी को जीवित पकड़ना सुरक्षाबलों के लिए एक बड़ी उपलब्धि होती. क्यों नहीं गोलियां ऐसी जगहों पर लगीं कि उन्हें जीवित किंतु असहाय स्थिति में पकड़ा जा सकता.

500 मीटर की दूरी से लगी गोली किशन जी के शरीर को छूने वाली पहली गोली थी, इस बात की क्या गारंटी है. क्या यह संभव नहीं है कि हत्या के दौरान गोलियां मारने के सिलसिले में एक गोली दूर से मारी गई हो.
गोलियां जिस तरह से शरीर को भेद कर जाती दिखाई दे रही हैं, वो पास से गोली मारे जाने का अंदेशा जाहिर करती हैं. दूर से लगी राइफल की गोली जब शरीर को चीरकर बाहर निकलती है तो मांस का एक बड़ा हिस्सा अपने साथ खींच ले जाती है. तस्वीरों से दिखता है कि गोली पास से मारी गई हैं इसलिए ज़ख्म गहरे हैं पर फैले हुए नहीं.

शरीर पर जगह जगह चोट के निशान हैं. इससे यातनाओं का संदेह पुख्ता होता है. हालांकि सरकार बार-बार मीडिया में ऐसी ख़बरें प्रसारित करवा रही है कि किशनजी के शरीर पर चोट के अतिरिक्त निशान कतई नहीं हैं. कुछ मुख्यधारा के समाचारपत्रों ने इसी बड़ी प्रमुखता से छापा भी है.

एन्काउंटर को लेकर जो संदेह लोगों के मन में हैं, उसका जवाब दे पाने में सरकार असमर्थ दिखाई दे रही है. चिंताजनक यह है कि इससे सरकार को हासिल कम, नुकसान ज़्यादा होगा.

माओवादी नेता चेरुकुरी आज़ाद के एन्काउंटर के मामले को ही याद कीजिए. किशनजी की तरह उनसे भी बातचीत की कोशिशें की जा रही थीं. जब बात बनती नज़र आ रही थी, तभी उनका एन्काउंटर हो गया. ऐसा क्यों हो रहा है कि सरकार जिससे बात करना चाहती है, वो पुलिस मुठभेड़ में मारा जाता है.

आज़ाद के मामले में तो उनकी मां से हत्या के कुछ दिनों पहले ही सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखकर अपने बेटे यानी आज़ाद के फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने का अंदेशा जाहिर किया था. उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि पुलिस उनके बेटे को फर्जी मुठभेड़ में मारने की कोशिश कर रही है. और वही हुआ, आज़ाद और पत्रकार हेमचंद्र की हत्या कर दी गई और उसे मुठभेड़ का नाम दे दिया गया.

संसाधनों की अंधी लूट में लगी सरकार रोज़ कितने ही लोगों के उजड़ने, पलायन करने, पुलिसिया दमन, उनके भूखे मरने और आत्महत्याएं करने का कारण बन रही है. इससे मुंह छिपाने के लिए नक्सलवाद को देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती की प्रेस विज्ञप्ति आए दिन केंद्र सरकार जारी करती रहती है. पर नक्सलवाद से निपटने के लिए सरकार की जो लोकतांत्रिक और जायज कोशिशें होनी चाहिए, उनका गला खुद सरकार घोट रही है.

आज़ाद के बाद अब किशनजी के फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने की घटना को सरका भले ही एक बड़ी उपलब्धि बताए पर इससे बातचीत के लिए आगे के रास्तों को सरकार ने खुद ही बंद कर लिया है. प्रतिक्रिया में माओवादियों की ओर से होने वाली हिंसा और सरकार की उनसे निपटने के नाम पर की जाने वाली प्रतिहिंसा से सबसे ज़्यादा आम आदमी प्रभावित होगा.

अफसोस, कि आम आदमी की सुरक्षा के नाम पर हद तक अलोकतांत्रिक हो चली सरकार अपने हाथ आम लोगों के खून से रंगती जा रही है. ताज़ा घटना सुलह और बातचीत की संभावना का एन्काउंटर करने जैसा है.
साभार- प्रतिरोध.कॉम

‎'ਝੂਠੇ ਮੁਕਾਬਲਿਆਂ ਦਾ ਵਰਤਾਰਾ ਅਤੇ ਜਮਹੂਰੀ ਹੱਕਾਂ ਦਾ ਸੁਆਲ' ਵਿਸ਼ੇ 'ਤੇ

 ਜਮਹੂਰੀ ਫਰੰਟ ਵੱਲੋਂ ਸੂਬਾਈ ਕਨਵੈਨਸ਼ਨ ਅਤੇ ਮਾਰਚ: 10 ਦਸੰਬਰ ਨੂੰ

ਜਲੰਧਰ: 29 ਨਵੰਬਰ ਸੰਸਾਰ ਭਰ 'ਚ ਮਨਾਏ ਜਾਂਦੇ ਕੌਮਾਂਤਰੀ ਮਨੁੱਖੀ ਅਧਿਕਾਰ ਦਿਵਸ ਮੌਕੇ 10 ਦਸੰਬਰ ਨੂੰ ਦਿਨੇ 11 ਵਜੇ ਨਹਿਰੂ ਪਾਰਕ ਮੋਗਾ ਵਿਖੇ ਅਪਰੇਸ਼ਨ ਗਰੀਨ ਹੰਟ ਵਿਰੋਧੀ ਜਮਹੂਰੀ ਫਰੰਟ (ਪੰਜਾਬ) ਵੱਲੋਂ ''ਝੂਠੇ ਮੁਕਾਬਲਿਆਂ ਦਾ ਵਰਤਾਰਾ ਅਤੇ ਮਨੁੱਖੀ ਅਧਿਕਾਰ'' ਵਿਸ਼ੇ ਉਪਰ ਸੂਬਾਈ ਕਨਵੈਨਸ਼ਨ ਅਤੇ ਰੋਸ ਮਾਰਚ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇਗਾ।

ਸ਼੍ਰੋਮਣੀ ਨਾਟਕਕਾਰ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰਸ਼ਰਨ ਸਿੰਘ ਦੀ ਸਰਪ੍ਰਸਤੀ ਅਤੇ ਕਨਵੀਨਰਸ਼ਿਪ ਹੇਠ ਪੰਜਾਬ ਅੰਦਰ 2 ਵਰ੍ਹੇ ਪਹਿਲਾਂ ਗਠਿਤ ਹੋਏ 'ਅਪਰੇਸ਼ਨ ਗਰੀਨ ਹੰਟ ਵਿਰੋਧੀ ਜਮਹੂਰੀ ਫਰੰਟ (ਪੰਜਾਬ)' ਦੇ ਕੋ-ਕਨਵੀਨਰ ਡਾ. ਪਰਮਿੰਦਰ ਸਿੰਘ, ਪ੍ਰੋ.ਏ.ਕੇ. ਮਲੇਰੀ, ਯਸ਼ਪਾਲ ਨੇ ਅੱਜ ਇਥੇ ਜਾਰੀ ਕੀਤੇ ਲਿਖਤੀ ਪ੍ਰੈਸ ਬਿਆਨ 'ਚ ਇਹ ਜਾਣਕਾਰੀ ਦਿੰਦਿਆਂ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਸੀ.ਪੀ.ਆਈ. (ਮਾਓਵਾਦੀ) ਪਾਰਟੀ ਦੇ ਚੋਟੀ ਦੇ ਆਗੂ ਕਾਮਰੇਡ ਕੋਟੇਸ਼ਵਰ ਰਾਓ ਕਿਸ਼ਨਜੀ ਨੂੰ ਜਿਵੇਂ ਝੂਠੇ ਮੁਕਾਬਲੇ ਦੀ ਥੋਥੀ ਕਹਾਣੀ ਘੜਕੇ ਗੋਲੀਆਂ ਨਾਲ ਉਡਾਇਆ ਗਿਆ ਹੈ ਇਹ ਫਾਸ਼ੀ ਵਰਤਾਰਾ ਸਾਬਤ ਕਰਦਾ ਹੈ ਕਿ ਸੰਸਾਰ ਦੀ ਵੱਡੀ ਜਮਹੂਰੀਅਤ ਹੋਣ ਦਾ ਦੰਭ ਕਰਦੀ ਭਾਰਤੀ ਸਟੇਟ ਅਸਲ 'ਚ ਲੋਕ ਹੱਕਾਂ ਅਤੇ ਲੋਕ-ਮੁਕਤੀ ਦੀ ਗੱਲ ਕਰਨ ਵਾਲਿਆਂ ਦੇ ਆਪਣੇ ਰਾਜਨੀਤਕ ਵਿਚਾਰਾਂ ਅੱਗੇ ਖੜ੍ਹਨ ਦਾ ਦਮ ਨਹੀਂ ਰੱਖਦੇ। ਇਸ ਲਈ ਅਪਰੇਸ਼ਨ ਗਰੀਨ ਹੰਟ, ਨਿੱਜੀ ਹਥਿਆਰਬੰਦ ਸੈਨਾਵਾਂ ਅਤੇ ਭਾੜੇ ਦੇ ਸੂਹੀਆਂ ਰਾਹੀਂ ਕਰਾਂਤੀਕਾਰੀਆਂ ਦੇ ਸਿਆਸੀ ਕਤਲ ਕਰਨ ਦੇ ਗਿਣੇ ਮਿਥੇ ਏਜੰਡੇ ਨੂੰ ਸਰ-ਅੰਜਾਮ ਦੇਣ ਦਾ ਅਪਰਾਧ ਕਰਨ 'ਤੇ ਉਤਰ ਆਈ ਹੈ। ਜੇਕਰ ਤੁਰੰਤ ਪੈਰ ਇਸ ਖਿਲਾਫ਼ ਬੁੱਧੀਜੀਵੀਆਂ, ਜਮਹੂਰੀਅਤਪਸੰਦ ਇਨਕਲਾਬੀ ਸ਼ਕਤੀਆਂ, ਲੇਖਕਾਂ, ਪੱਤਰਕਾਰਾਂ, ਤਰਕਸ਼ੀਲਾਂ, ਇਨਸਾਫ਼ਪਸੰਦ ਹਲਕਿਆਂ ਨੇ ਜਨਤਕ ਪ੍ਰਤੀਰੋਧ ਦੀ ਲਹਿਰ ਨਾ ਖੜ੍ਹੀ ਕੀਤੀ ਤਾਂ ਭਵਿੱਖ ਵਿਚ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ ਵੀ ਮੁੜ ਝੂਠੇ ਪੁਲਸ ਮੁਕਾਬਲਿਆਂ ਦਾ ਮਨਹੂਸ ਦੌਰ ਫੇਰ ਝੱਲਣਾ ਪਵੇਗਾ। ਜਿਸ ਦੀਆਂ ਘਿਨੌਣੀਆਂ ਕਹਾਣੀਆਂ, ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਜਾਗਰੂਕ ਅਤੇ ਮਾਨਵੀ ਅਧਿਕਾਰਾਂ ਦੇ ਝੰਡਾਬਰਦਾਰਾਂ ਦੇ ਚੇਤਿਆਂ 'ਚ ਸਦਾ ਖਟਕਦੀਆਂ ਰਹਿੰਦੀਆਂ ਹਨ।

ਕੋ-ਕਨਵੀਨਰਾਂ ਨੇ 10 ਦਸੰਬਰ ਨੂੰ 'ਝੂਠੇ ਮੁਕਾਬਲਿਆਂ ਦੇ ਵਰਤਾਰੇ ਅਤੇ ਜਮਹੂਰੀ ਹੱਕਾਂ ਦਾ ਸੁਆਲ' ਮੁੱਦੇ ਉਪਰ ਗੰਭੀਰ ਵਿਚਾਰਾਂ ਕਰਨ ਅਤੇ ਰੋਸ ਮਾਰਚ ਰਾਹੀਂ ਆਪਣਾ ਵਿਰੋਧ ਦਰਜ ਕਰਾਉਣ ਲਈ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਸਮੂਹ ਬੁੱਧੀਮਾਨ ਤਬਕਿਆਂ ਅਤੇ ਲੋਕ ਹੱਕਾਂ ਲਈ ਜੂਝ ਦੇ ਸੰਗਰਾਮੀਆਂ ਨੂੰ ਵੱਧ ਚੜ੍ਹਕੇ ਕਨਵੈਨਸ਼ਨ 'ਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹੋਣ ਦੀ ਪੁਰਜ਼ੋਰ ਅਪੀਲ ਕੀਤੀ ਹੈ।

ਉਨ੍ਹਾਂ ਕਿਹਾ ਹੈ ਕਿ ਝੂਠੇ ਮੁਕਾਬਲਿਆਂ ਦੇ ਵਰਤਾਰੇ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਝਾਰਖੰਡ ਦੇ ਉੱਘੇ ਲੋਕ ਕਵੀ ਜਤਿਨ ਮਰਾਂਡੀ ਨੂੰ ਦਿੱਤੀ ਫਾਂਸੀ ਦੀ ਸਜ਼ਾ ਰੱਦ ਕਰਾਉਣ ਇਰੋਮਾ ਸ਼ਰਮੀਲਾ ਵੱਲੋਂ ਬੀਤੇ 11 ਵਰ੍ਹੇ ਤੋਂ ਭੁੱਖ ਹੜਤਾਲ ਕਰਕੇ 'ਸੁਰੱਖਿਆ ਫੌਜਾਂ ਨੂੰ ਦਿਤੇ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਅਧਿਕਾਰ' ਰੱਦ ਕਰਨ ਦੀ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਮੰਗ ਨੂੰ ਪ੍ਰਵਾਨ ਕਰਨ ਅਤੇ 10 ਦਸੰਬਰ ਦੇ ਕੌਮਾਂਤਰੀ ਮਾਨਵੀ ਅਧਿਕਾਰ ਦਿਵਸ ਦੀ ਮਹੱਤਤਾ ਉਭਾਰਨ ਉਪਰ ਵੀ ਕਨਵੈਨਸ਼ਨ ਆਪਣੀ ਵਿਚਾਰ-ਚਰਚਾ ਨੂੰ ਕੇਂਦਰਤ ਕਰੇਗੀ।

ਜਾਰੀ ਕਰਤਾ:
ਡਾ. ਪਰਮਿੰਦਰ ਸਿੰਘ,ਕੋ-ਕਨਵੀਨਰ
ਅਪਰੇਸ਼ਨ ਗਰੀਨ ਹੰਟ ਵਿਰੋਧੀ ਜਮਹੂਰੀ ਫਰੰਟ (ਪੰਜਾਬ)
ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਯੂਨੀਵਰਸਿਟੀ, ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ
ਸੰਪਰਕ: 95010 25030

Sunday, November 27, 2011

PAYING HOMAGE TO M.KOTESHWARA RAO @ KISHANJI

HOMAGE TO A GREAT SON OF THE PEOPLE - KISHANJI

 A deserted street in Peddapalli, the hometown of slain Maoist leader Kishenji on Saturday. Kishenji was cremated in Peddapalli on Sunday. Photo : The Hindu

Poet & Civil Liberties leader Varavara Rao addresses activists in Kolkata. 
The dead body of Kishanji being handed over to his family members & poet Varvara Rao
An ambulance carrying the body of Kishenji's body being sent to Peddpally village in Karimnagar district on Saturday. PHOTO: G RAMAKRISHNA
Balladeer Gaddar pays tributes to slain Maoist leader Kishenji in Peddapalli, Karimnagar district on Sunday. Photo: Thakur Ajay Pal Singh
Police & para-military forces Jangal Mahal area after the alleged encounter killing of Kishanji
Kishanji's mother  Madhuramma in grief after her son Kishenji's death, in Peddapalli town of Karimnagar district on Friday. 

Mallojula Koteswara Rao alias Kishenji, the senior Maoist leader was cremated at his native Peddapalli, some 35 km from Karimnagar. His elder brother Anjaneyulu lit the funeral pyre. Abhay, the spokesperson of the Maoist Central Committee released a letter which was read out by the revolutionary writer Varavara Rao, in which it was alleged that Kishenji was murdered in a fake encounter. The Communist Party of India (Maoist) called for a two-day Bharat bandh on December 4 and 5, 2011 in protest of the encounter.

Earlier many villagers, political leaders, including ballad Singer Gaddar, Civil Liberties Committee leaders Mr. Varavara Rao, Kalyan Rao, Telangana Rashtra Samithi MLAs Etela Rajender, Koppula Eeshwar, MLC N. Laxman Rao were among those participated in the funeral procession.
Kishenji’s body was brought to Peddapalli from Kolkata in the wee hours of Sunday and kept at his residence after the local police denied permission to his family members to keep the body for public viewing at the Junior College ground. While large number of activists from different peoples' organizations assembled at the airport to receive the body, the police deployed several teams at the arrival lounge to prevent them.

The moment poet Vara Vara Rao and Padma Kumari of Martyrs United Forum, who came along with the body from Kolkata, entered the arrival lounge; the police rounded up them and seized their mobile phones. They did not allow anyone, including the media persons, to come even close to the arrival lounge. Balladeer Gaddar entered into an argument with the policemen as he was not allowed to go inside. “If some Congress leader dies, his body is taken to Gandhi Bhavan. We want to take the body to Tank Bund to pay homage. How can you deny this?” he said.
Earlier Varavara Rao on Sunday dubbed Maoist leader Kishenji’s encounter as a “political murder”, saying, “Kishenji’s encounter is part of operation green hunt and the government should stop combing in the name of the operation. His (Kishenji’s) encounter was a political murder,”
Mr. Rao's suspicion was that Kishenji had been taken into police custody on Wednesday itself, tortured and later killed in a fake encounter. First media reports suggested that Kishenji and his comrades had been encircled by a thousand paramilitary forces, but it was announced that he had managed to escape.
“If he had managed to escape to Jharkhand, how did the West Bengal government kill him? How did the joint security forces kill him in Paschim Medinipur district,” Mr. Rao asked.

He also alleged that signs of torture were visible on Kishenji's body and said that he suspected that Kishenji was “severely tortured” in police custody.
In a press statement issued by the Co-ordination of Democratic Rights Organizations (CDRO), representing 27 Democratic Rights Organizations, it has been stated that:

“We strongly condemn the killing of Mallojula Koteswara Rao alias Kishenji, politbureau member of the CPI(Maoist) at Burisole forest near Jhargram in West Bengal on 24th November 2011. It is being claimed by the West Bengal police and the CRPF authorities that Kishenji has been killed in a “30 minute gunbattle” near Khushboni village in Burisole forests of West Midnapur district, while some other members of the Maoist squad escaped. However, this version of the police is riddled with contradictions, and also accounts from villagers in nearby villages strongly suggest that Kishenji has been killed in a fake encounter. According to local reports, Kishenji was captured during an operation by the joint forces in the area on 23rd November, and killed in cold blood on 24th November during a staged gun battle.”

B D Sharma (Former National Commissioner for Scheduled Castes and Tribes) and G N Saibaba (Deputy Secretary, Revolutionary Democratic Front), said in a Press statement:

“We strongly condemn the cold-blooded murder and planned assassination of Kishanji alias Mallojula Koteswara Rao, Politburo Member of CPI (Maoist) in Burishol forest area, Paschim Midnapore District, Jangalmahal, West Bengal on 24 November 2011. At the time of this murder Kishanji was dealing with the process of peace talks through the interlocutors appointed by the Chief Minister of West Bengal Ms. Mamata Banerjee. Such a heinous crime should be condemned by all justice loving people.” 

An other human rights organization MASUM, CPI leader Gurudas Dasgupta & Swami Agnivesh has also condemned the killing of Kishenji in a fake encounter and demanded a proper inquiry. 

C. P. I. (Maoist) Polit Bureau member Koteshwara Rao, more famous as Kishenji, was leading the peoples struggle in the forests of Jangal Mahal region, but was equally adept as the spokesperson for the cause. He will perhaps be best remembered since the occasion he released Atindranath Dutta, officer in charge of the Sankrail police station, who was abducted in an audacious attack in October 2009, in exchange for bail for 14 tribal women.
Kishenji, born Oct 10, 1953, in a village in Andhra Pradesh, was among the founders of the People's War Group there in 1980. It was in 1974 that he joined the Radical Students Union. Four years later, he went into hiding. His organizational skills and devotion to the peoples cause impressed People's War Group (PWG) founder Kondapalli Seetaramayya and he was chosen to be PWG state secretary.  He was a prime target of joint-security operations against Maoists.

Gloom descended on his home town. Since morning on Friday, hordes of supporters and relatives have arrived at his ancestral house in the narrow Brahmanaveedhi, a small street, to console the bereaved family members, including mother Madhuramma and elder brother Anjaneyulu.
Madhuramma, in her 80s, was in a state of shock over the death of her son ‘Koti.' Initially, family members decided against breaking the news to her. But when people and journalists started coming in droves, they had no alternative except informing her. She collapsed on hearing the news but controlled her emotions. “I thought you would wipe away the tears from the eyes of several mothers by staying away from us. But this is a big shock to me, as I have not seen him for the last 33 years after he left home,” said Madhuramma. The family had not seen him for over three decades.
Madhuramma’s. younger son, Mallujola Venugopal Rao, has also gone underground for the past three decades. He is now a Central Committee member of the CPI (Maoist).

N.K.JEET
Advisor, Lok Morcha Punjab

Wednesday, November 16, 2011

ਹਿੰਦ ਵਾਸੀਓ ਰੱਖਣਾ ਯਾਦ ਸਾਨੂੰ,

ਹਿੰਦ ਵਾਸੀਓ ਰੱਖਣਾ ਯਾਦ ਸਾਨੂੰ,
ਕਿਤੇ ਦਿਲਾਂ'ਚੋਂ ਨਾ ਭੁਲਾ ਜਾਣਾ ‌‌‌॥

ਖਾਤਰ ਵਤਨ ਦੀ ਲੱਗੇ ਹਾਂ ਚੜਨ ਫਾਂਸੀ,
ਸਾਨੂੰ ਦੇਖ ਕੇ ਨਾ ਘਬਰਾ ਜਾਣਾ ॥

ਸਾਡੀ ਮੌਤ ਨੇ ਵਤਨ ਦੇ ਵਾਸੀਆਂ ਦੇ,
ਦਿਲੀਂ ਵਤਨ ਦਾ ਇਸ਼ਕ ਜਗਾ ਜਾਣਾ ॥

ਹਿੰਦ ਵਾਸੀਓ ਚਮਕਣਾ ਚੰਦ ਵਾਂਗੂ,
ਕਿਤੇ ਬੱਦਲਾਂ ਹੇਠ ਨਾ ਆ ਜਾਣਾ ॥

ਕਰਕੇ ਦੇਸ਼ ਦੇ ਨਾਲ ਧਰੋ ਯਾਰੋ,
ਦਾਗ਼ ਕੋਮ ਦੇ ਮੱਥੇ ਨਾ ਲਾ ਜਾਣਾ ॥

ਮੂਲਾ ਸਿੰਘ ਕਿਰਪਾਲ ਨਵਾਬ ਵਾਂਗੂ,
ਅਮਰ ਸਿੰਘ ਨਾ ਕਿਸੇ ਕਹਾ ਜਾਣਾ ॥

ਜੇਲਾਂ ਹੋਣ ਕਾਲਜ ਵਤਨ ਸੇਵਕਾਂ ਦੇ,
ਦਾਖਲ ਹੋ ਕਿ ਡਿਗਰੀਆਂ ਪਾ ਜਾਣਾ॥

ਹੁੰਦੇ ਫੇਲ ਬਹੁਤੇ ਅਤੇ ਪਾਸ ਥੋੜੇ,
ਵਤਨ ਵਾਸੀਓ ਦਿਲ ਨਾ ਢਾਹ ਜਾਣਾ ॥

ਪਿਆਰੇ ਵੀਰਨੋ ਚੱਲੇ ਹਾਂ ਅਸੀਂ ਜਿੱਥੇ,
ਉਸੇ ਰਾਸਤੇ ਤੁਸੀ ਵੀ ਆ ਜਾਣਾ ॥

ਹਿੰਦ ਵਾਸੀਓ ਰੱਖਣਾ ਯਾਦ ਸਾਨੂੰ,
ਕਿਤੇ ਦਿਲਾਂ'ਚੋਂ ਨਾ ਭੁਲਾ ਜਾਣਾ ‌‌‌॥ 

Tuesday, November 15, 2011

ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਕਾਮਿਆਂ ਅਤੇ ਗੋਬਿੰਦਪੁਰਾ ਦੇ ਸੰਗਰਾਮ ਦੇ ਸੰਦਰਭ 'ਚ

ਬੁੱਧੀਜੀਵੀ ਅਤੇ ਜਮਹੂਰੀ ਹਲਕਿਆਂ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਦਾ ਮਹੱਤਵ
—ਅਮੋਲਕ ਸਿੰਘ (94170-76735)
ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਮਿੱਲਾਂ ਦੇ ਕਾਮਿਆਂ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਹੋਰਨਾਂ ਵਰਗਾਂ ਦੇ ਕੰਮ ਕਰਦੇ ਸਨਅਤੀ ਕਾਮਿਆਂ, ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ, ਮੁਲਾਜ਼ਮਾਂ, ਨੌਜਵਾਨਾਂ, ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ, ਕਿਸਾਨਾਂ, ਜਮਹੂਰੀਅਤ ਪਸੰਦ ਤਬਕਿਆਂ, ਸਾਹਿਤ, ਕਲਾ ਅਤੇ ਸਭਿਆਚਾਰ ਦੇ ਖੇਤਰ 'ਚ ਸਰਗਰਮ ਕਾਮਿਆਂ ਨੂੰ ਇਸ ਘੜੀ, ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਕਾਮਿਆਂ ਦੇ ਹੱਕ 'ਚ ਹਾਅ ਦਾ ਨਾਅਰਾ ਮਾਰਨ ਲਈ ਅੱਗੇ ਆਉਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।

ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਸਨਅਤੀ ਕੇਂਦਰ ਲੁਧਿਆਣਾ ਅੰਦਰ ਮਸ਼ੀਨਾਂ ਨਾਲ ਮਸ਼ੀਨਾਂ ਹੋਕੇ, ਲਹੂ-ਪਸੀਨਾ ਇੱਕ ਕਰਨ ਵਾਲੇ 20 ਲੱਖ ਕਾਮਿਆਂ ਦੇ ਅਰਮਾਨ ਮਿੱਲਾਂ ਦੀਆਂ ਚਿਮਨੀਆਂ ਰਾਹੀਂ ਧੂੰਆਂ ਬਣਕੇ ਉਡ ਰਹੇ ਹਨ।

ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਜਿਸਮ, ਭੱਠੀਆਂ 'ਚ ਬਲਦੇ ਹਨ ਉਹ ਜਾਣਦੇ ਨੇ ਕਿ ਜਦੋਂ ਲੋਹਾ ਪਿਘਲਦਾ ਹੈ ਤਾਂ ਭਾਫ਼ ਨਹੀਂ ਉੱਠਦੀ ਪਰ ਜਦੋਂ ਕਾਮਿਆਂ ਦੇ ਪਿੰਡਿਆਂ 'ਚੋਂ ਭਾਫ਼ ਨਿਕਲਦੀ ਹੈ ਤਾਂ ਲੋਹਾ ਪਿਘਲ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

ਇਹ 'ਵਿਕਾਸ' ਦੀ ਕੇਹੀ ਭਾਸ਼ਾ ਹੈ ਜਿਸਦੇ ਸ਼ੋਰ ਹੇਠ ਕਿਰਤੀਆਂ ਦੀ ਹੱਕੀ ਆਵਾਜ਼ ਅਣਸੁਣੀ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ। ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਕਾਮੇ 22 ਸਤੰਬਰ ਤੋਂ ਆਪਣੀਆਂ ਹੱਕੀ ਮੰਗਾਂ ਲਈ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਸਨਅਤੀ ਰਾਜਧਾਨੀ ਲੁਧਿਆਣਾ ਦੀਆਂ 150 ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਮਿੱਲਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ ਹੜਤਾਲ ਦੇ ਕਲਾਵੇ 'ਚ ਲੈ ਰਹੇ ਹਨ।

ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਕਾਮਿਆਂ ਨੇ ਨਾ ਕੋਈ ਖੇਤ ਮੰਗਿਆ ਹੈ ਨਾ ਕੋਈ ਦੇਸ਼। ਨਾ ਮਿੱਲਾਂ 'ਚ ਹਿੱਸੇਦਾਰੀ ਮੰਗੀ ਹੈ ਨਾ ਰਾਜ ਭਾਗ ਦੀ ਕੁਰਸੀ। ਕਾਮਿਆਂ ਨੇ ਓਹੀ ਕੁਝ ਮੰਗਿਆ ਹੈ ਜੋ ਕੁਝ ਦੇਣ ਦੇ ਕੌਲ-ਕਰਾਰ 'ਭਾਰਤੀ ਸੰਵਿਧਾਨ' ਕਰਦਾ ਹੈ। ਓਹੀ ਮੰਗਿਆ ਹੈ ਜੋ ਮਜ਼ਬੂਰੀਆਂ ਦੇ ਪੁੜਾਂ ਹੇਠ ਪਿਸਦੇ ਕਾਮਿਆਂ ਤੋਂ ਮਿੱਲ ਮਾਲਕ ਚਤੁਰਾਈ ਅਤੇ ਜ਼ੋਰ-ਜ਼ਬਰੀ ਨਾਲ ਨੱਪੀ ਬੈਠੇ ਹਨ। ਹਕੀਕਤਾਂ ਦੀ ਰੌਸ਼ਨੀ 'ਚ ਦੇਖਿਆ ਜਾਵੇ ਤਾਂ ਮਿੱਲ ਮਾਲਕ, ਭਾਰਤੀ ਸੰਵਿਧਾਨ ਦੀ ਨਜ਼ਰ 'ਚ ਮੁਜ਼ਰਿਮ ਬਣਦੇ ਹਨ। ਜਿਹੜੇ ਇਸ ਮੁਲਕ ਦੇ ਨਾਗਰਿਕਾਂ ਦੇ ਮੌਲਿਕ ਅਧਿਕਾਰਾਂ ਉਪਰ ਛਾਪਾ ਮਾਰ ਕੇ ਕਾਨੂੰਨੀ ਦ੍ਰਿਸ਼ਟੀ ਤੋਂ ਅਪਰਾਧ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ। ਕਿਸੇ ਕੋਨੇ ਤੋਂ ਆਵਾਜ਼ ਉਠਣ ਜਾਂ ਉਠਾਉਣ ਦੀ ਬਜਾਏ ਹੱਕ ਅਤੇ ਸੱਚ ਦੀ ਮੂੰਹ ਜ਼ੋਰ ਮੰਗ ਤਾਂ ਇਹੀ ਹੈ ਕਿ ਲੱਖਾਂ ਕਾਮਿਆਂ ਦੀ ਕਿਰਤ ਕਮਾਈ ਅਤੇ ਜਮਹੂਰੀ ਹੱਕਾਂ ਦੀ ਰਾਖੀ ਲਈ ਸਰਕਾਰੀ ਤੰਤਰ ਕਾਮਿਆਂ ਦੀ ਬਾਂਹ ਫੜਦਾ। ਹੋਇਆ ਇਸਤੋਂ ਬਿਲਕੁਲ ਉਲਟ ਹੈ। ਕਿਰਤੀਆਂ ਦੀ ਬਾਂਹ ਫੜਨ ਦੀ ਵਜਾਏ ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਸੰਘੀ ਫੜੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ।

ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਕਾਮਿਆਂ ਨੂੰ ਲੰਮੀ ਹੜਤਾਲ 'ਤੇ ਜਾਣ ਦੀ ਨੌਬਤ ਹੀ ਨਹੀਂ ਸੀ ਆਉਣੀ ਜੇ ਸਰਕਾਰ ਕਿਰਤ-ਵਿਭਾਗ ਅਤੇ ਪ੍ਰਸ਼ਾਸ਼ਨ ਆਦਿ ਦਾ ਤਾਣਾ-ਬਾਣਾ, ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਮਾਲਕਾਂ ਨੂੰ ਨਕੇਲ ਪਾਉਣ ਲਈ ਅੱਗੇ ਆਉਂਦਾ। ਪਰ ਇੱਥੇ ਤਾਂ ਡਾਢਿਆਂ ਦਾ ਸੱਤੀਂ ਵੀਹਵੀਂ ਸੌ ਹੈ। ਵਿਚਾਰ-ਚਰਚਾਵਾਂ, ਗੇਟ ਮੀਟਿੰਗਾਂ, ਰੈਲੀਆਂ, ਵਿਖਾਵਿਆਂ, ਧਰਨਿਆਂ ਆਦਿ ਦੇ ਦੌਰਾਂ ਵਿਚੀਂ ਗੁਜ਼ਰਦੇ ਕਾਮੇ ਆਪਣੇ ਹੱਡੀਂ ਹੰਢਾਏ ਤਜ਼ਰਬਿਆਂ ਤੋਂ ਮੂੰਹੋਂ ਮੂੰਹ ਕਹਿਣ ਲੱਗ ਪਏ ਹਨ ਕਿ ਇੱਥੇ ਕਾਇਦੇ-ਕਾਨੂੰਨ ਲੋਕਾਂ ਲਈ ਹੋਰ ਅਤੇ ਜੋਕਾਂ ਲਈ ਹੋਰ ਹਨ। ਕਾਮਿਆਂ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ ਕਿ, ਅਸੀਂ ਮਿੱਲ ਮਾਲਕਾਂ ਤੋਂ ਕਿਹੜਾ ਹਵਾਈ ਜਹਾਜ਼ ਮੰਗ ਲਿਐ, ਅਸੀਂ ਆਪਣੀ ਕਿਰਤ ਦਾ ਮੁੱਲ ਮੰਗਿਐ ਜਾਂ ਉਹ ਸਹੂਲਤਾਂ ਮੰਗੀਆਂ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਬਾਰੇ ਅਕਸਰ ਹੀ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਕਿ ਇਹ ਤਾਂ ਕਾਮਿਆਂ ਦਾ ਅਧਿਕਾਰ ਹੀ ਹੈ? ਫਿਰ ਇਹ ਪ੍ਰਵਾਨ ਕਰਨ ਦੀ ਬਜਾਏ ਸਾਨੂੰ, ਸਾਡੇ ਪਰਿਵਾਰਾਂ ਨੂੰ ਲੰਮੀ ਪੜਤਾਲ ਦੇ ਮੂੰਹ ਧੱਕ ਕੇ, ਸਾਨੂੰ ਭੁੱਖੇ ਮਾਰਨ ਅਤੇ ਦਮੋਂ ਕੱਢਕੇ ਆਪਣੇ ਚਰਨੀਂ ਲਾਉਣ ਤੇ ਮਜ਼ਬੂਰ ਕਰਨ ਦੀ ਇਹ ਸਾਜਸ਼ ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਹੋਰ ਕੀ ਹੈ? ਕਾਮਿਆਂ ਦਾ ਕਹਿਣਾ ਹੈ ਕਿ ਬੇ-ਗੈਰਤ ਹੋ ਕੇ ਜੀਣ ਨਾਲੋਂ ਮੌਤ ਹਜ਼ਾਰ ਦਰਜ਼ੇ ਚੰਗੀ ਹੈ। ਅਸੀਂ ਆਪਣੇ ਹੱਕ ਲੈ ਕੇ ਰਹਾਂਗੇ ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਮਿੱਲਾਂ 'ਚ ਕੰਮ ਠੱਪ ਰਹੇਗਾ।

ਉਦਾਸ ਹੋਣ ਦੀ ਬਜਾਏ ਕਾਮੇ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ 'ਚ ਨੇ। ਉਹ ਮਿੱਲ ਮਾਲਕਾਂ ਦੀਆਂ ਸਭ ਚਾਲਾਂ ਨੂੰ ਨਿਰਖਣ-ਪਰਖਣ ਲੱਗੇ ਹਨ। ਉਹ ਬਹੁਤ ਹੀ ਠਰੰਮੇ ਅਤੇ ਸੂਝ-ਸਿਆਣਪ ਨਾਲ ਆਪਣੀ ਜੱਦੋਜਹਿਦ ਨੂੰ ਦ੍ਰਿੜਤਾ ਨਾਲ ਚਲਾ ਰਹੇ ਹਨ।

ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਮਿੱਲਾਂ ਦੇ ਕਾਮਿਆਂ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਹੋਰਨਾਂ ਵਰਗਾਂ ਦੇ ਕੰਮ ਕਰਦੇ ਸਨਅਤੀ ਕਾਮਿਆਂ, ਖੇਤ ਮਜ਼ਦੂਰਾਂ, ਮੁਲਾਜ਼ਮਾਂ, ਨੌਜਵਾਨਾਂ, ਵਿਦਿਆਰਥੀਆਂ, ਕਿਸਾਨਾਂ, ਜਮਹੂਰੀਅਤ ਪਸੰਦ ਤਬਕਿਆਂ, ਸਾਹਿਤ, ਕਲਾ ਅਤੇ ਸਭਿਆਚਾਰ ਦੇ ਖੇਤਰ 'ਚ ਸਰਗਰਮ ਕਾਮਿਆਂ ਨੂੰ ਇਸ ਘੜੀ, ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਕਾਮਿਆਂ ਦੇ ਹੱਕ 'ਚ ਹਾਅ ਦਾ ਨਾਅਰਾ ਮਾਰਨ ਲਈ ਅੱਗੇ ਆਉਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।
ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਕਾਮਿਆਂ ਦੀਆਂ ਮੰਗਾਂ ਬਿਲਕੁਲ ਹੱਕੀ ਅਤੇ ਜਾਇਜ਼ ਹਨ। ਉਹ ਮੰਗ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ ਕਿ ਸਾਨੂੰ ਪੱਕਿਆਂ ਕਰੋ। ਹਾਜ਼ਰੀ ਰਜਿਸਟਰ ਲਗਾਓ। ਪਹਿਚਾਣ-ਪੱਤਰ ਅਤੇ ਹਾਜ਼ਰੀ ਕਾਰਡ ਦਿਓ। ਈ.ਐਸ.ਆਈ., ਬੋਨਸ, ਪੀ.ਐਫ., ਹਫ਼ਤਾਵਾਰ ਅਤੇ ਹੋਰ ਬਣਦੀਆਂ ਛੁੱਟੀਆਂ ਦਿੱਤੀਆਂ ਜਾਣ। ਕਿਰਤ-ਕਾਨੂੰਨ ਲਾਗੂ ਕੀਤੇ ਜਾਣ। ਅੰਬਰ ਛੋਹ ਰਹੀ ਮਹਿੰਗਾਈ ਕਾਰਨ ਤਨਖ਼ਾਹਾਂ 'ਚ ਵਾਧਾ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ। ਤੱਥ ਮੂੰਹੋਂ ਬੋਲਦੇ ਹਨ ਕਿ ਪਿਛਲੇ 20 ਵਰ੍ਹਿਆਂ ਤੋਂ ਲਗਭਗ ਓਹੀ ਰੇਟ/ਤਨਖਾਹਾਂ ਚੱਲੀਆਂ ਆ ਰਹੀਆਂ ਹਨ ਜਦੋਂ ਕਿ ਮਹਿੰਗਾਈ ਨੇ ਕਮਿਆਂ ਦਾ ਕਚੁੰਮਰ ਕੱਢ ਰੱਖਿਆ ਹੈ।

ਆਰਥਕ ਤੰਗੀਆਂ ਦੇ ਭੰਨੇ ਕਾਮੇਂ 14-14 ਘੰਟੇ ਲਟਾ-ਪੀਂਘ ਹੋ ਕੇ ਕੰਮ ਕਰਕੇ ਵੀ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦਾ ਭੱਠ ਝੋਕ ਰਹੇ ਹਨ। ਦੂਜੇ ਬੰਨੇ ਵਿਹਲੜ ਜਿਹੜੇ ਡੱਕਾ ਤੋੜ ਕੇ ਦੂਹਰਾ ਨਹੀਂ ਕਰਦੇ ਉਹ ਮੌਜ਼ਾਂ ਮਾਣਦੇ ਹਨ। ਜੇ ਕਿਤੇ ਸਾਡਾ ਏਕਾ ਲੋਹੇ ਵਰਗਾ ਹੋ ਜਾਵੇ, ਕਾਮੇ ਚੇਤੰਨ ਹੋ ਜਾਣ ਤਾਂ ਅਸੀਂ ਆਪਣੀ ਤਕਦੀਰ ਦੇ ਆਪ ਮਾਲਕ ਹੋ ਸਕਦੇ ਹਾਂ। ਅਜੇ ਤਾਂ 20 ਲੱਖ ਕਾਮਿਆਂ 'ਚੋਂ ਕਰੀਬ 2600 ਹੀ ਕਾਮਾ ਹੈ ਜਿਸਨੇ ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਮਿੱਲਾਂ ਅੰਦਰ ਆਪਣੇ ਹੱਕ ਦਾ ਰੰਗ ਵਿਖਾਇਆ ਹੈ। ਐਨੇ ਨਾਲ ਹੀ ਮਾਲਕਾਂ ਦੇ ਹੱਥਾਂ ਦੇ ਭਾਂਡੇ ਸੁੱਟੇ ਪਏ ਹਨ। ਇਸ ਤਰੰਗ ਨੂੰ ਥਾਏਂ ਨੱਪਣ ਲਈ ਅਨੇਕਾਂ ਪਾਪੜ ਵੇਲੇ ਜਾ ਰਹੇ ਹਨ।

ਸਚਾਈ ਕਦੇ ਜਬਰ ਦੇ ਜ਼ੋਰ ਨਹੀਂ ਦਬਦੀ। ਨਾ ਹੀ ਝੂਠ ਦੇ ਪੁਲੰਦਿਆਂ ਦੇ ਭਾਰ ਹੇਠ ਨੱਪੀ ਜਾ ਸਕਦੀ ਹੈ। ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਕਾਮਿਆਂ ਦਾ ਹੱਕੀ ਘੋਲ ਇਹੋ ਸਚਾਈ ਦੀ ਕਹਾਣੀ ਬਿਆਨ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਕਾਮਿਆਂ ਦਾ ਸੈਲਾਬ ਲੁਧਿਆਣਾ ਦੀਆਂ ਸੜਕਾਂ 'ਤੇ ਨਿਕਲ ਤੁਰਿਆ ਹੈ। ਹੁਣ ਮਿੱਲਾਂ ਦੇ ਗੇਟ 'ਤੇ ਕੰਮ ਸ਼ੁਰੂ ਹੋਣ ਅਤੇ ਬੰਦ ਹੋਣ ਦੇ ਘੁੱਗੂ ਖ਼ਾਮੋਸ਼ ਨੇ। ਗੇਟਾਂ 'ਤੇ ਗੂੰਜ ਪੈਂਦੀ ਹੈ ਨਾਅਰਿਆਂ ਦੀ। ਕਿਰਤ-ਵਿਭਾਗ ਦੇ ਦਫ਼ਤਰ ਅੱਗੇ ਧਮਕ ਪੈਂਦੀ ਹੈ ਰੋਹਲੇ ਮਾਰਚਾਂ ਦੀ। ਮਿੱਲ ਮਾਲਕਾਂ ਦੀ ਰਾਤਾਂ ਦੀ ਨੀਂਦ ਉਡ ਗਈ। ਉਹ ਬੁਖ਼ਲਾਏ ਹੋਏ ਜੋ ਮੂੰਹ ਆਇਆ ਉਹ ਮਾਇਆ ਦੇ ਜ਼ੋਰ ਅਖ਼ਬਾਰਾਂ 'ਚ ਇਸ਼ਤਿਹਾਰ ਛਪਾਉਣ ਭੱਜ ਤੁਰੇ। ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਭਰਮ ਹੈ ਕਿ ਸ਼ਾਇਦ ਅਸੀਂ ਕੂੜ ਦਾ ਅੰਬਾਰ ਖੜ੍ਹਾ ਕਰਕੇ ਸੱਚ ਦਾ ਸੂਰਜ ਚੜ੍ਹਨ ਤੋਂ ਡੱਕ ਲਵਾਂਗੇ। ਮਿੱਲ ਮਾਲਕਾਂ ਨੇ ਕੁਝ ਅਖ਼ਬਾਰਾਂ 'ਚ ਇਸ਼ਤਿਹਾਰ ਲਗਵਾਇਆ ਹੈ ਕਿ :

''ਸਤਿਕਾਰਤ ਅਤੇ ਪਰਮ ਪਿਆਰੇ ਮੁੱਖ ਮੰਤਰੀ ਸਾਹਿਬਾਨ ਜੀਓ, ਲੁਧਿਆਣਾ ਸ਼ਹਿਰ ਉਪਰ ਦਹਿਸ਼ਤਵਾਦ ਦਾ ਖ਼ਤਰਾ ਮੰਡਰਾ ਰਿਹਾ ਹੈ ਇਸ ਕਰਕੇ ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਮਜ਼ਦੂਰ ਯੂਨੀਅਨ ਅਤੇ ਇਸ ਦੇ ਆਗੂਆਂ ਉਪਰ ਸਖ਼ਤ ਕਾਰਵਾਈ ਕੀਤੀ ਜਾਵੇ।''

ਇਹਨੂੰ ਕਹਿੰਦੇ ਨੇ 'ਉਲਟਾ ਚੋਰ ਕੋਤਵਾਲ ਕੋ ਡਾਂਟੇ'। ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਕਾਮੇ, ਸ਼ਹਿਰ ਦੇ ਹੋਰ ਸਨਅਤੀ ਕਾਮੇ, ਮਿਹਨਤਕਸ਼ ਵਰਗ ਅਤੇ ਜਮਹੂਰੀਅਤ/ਇਨਸਾਫ ਪਸੰਦ ਲੋਕ-ਹਿੱਸੇ ਜਾਣਦੇ ਨੇ ਕਿ ਕਿਵੇਂ ਹੱਕ, ਸੱਚ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਦਬਾਉਣ ਲਈ ਮਿੱਲ ਮਾਲਕ 'ਹਾਕੀ ਬਰਗੇਡ' ਬਣਾ ਕੇ ਅਤੇ ਦਹਿਸ਼ਤਗਰਦ ਗਰੋਹਾਂ ਨੂੰ ਥਾਪੜਾ ਦੇ ਕੇ ਕਾਮਿਆਂ ਨੂੰ ਦਹਿਸ਼ਤਜ਼ਦਾ ਕਰਨ ਅਤੇ ਉਜਾੜਨ ਲਈ ਨਾਦਰਸ਼ਾਹੀ ਹੱਲੇ ਬੋਲਦੇ ਰਹੇ ਹਨ।

ਹੁਣ ਫੇਰ 'ਦਹਿਸ਼ਤਗਰਦੀ' ਦਾ ਝੂਠਾ ਡਰ ਖੜ੍ਹਾ ਕਰਕੇ ਅਸਲ 'ਚ ਹੱਕੀ ਸੰਘਰਸ਼ ਲੜਦੇ ਕਾਮਿਆਂ ਉਪਰ ਦਹਿਸ਼ਤਗਰਦੀ ਦੇ ਝੱਖੜ ਝੁਲਾਉਣ ਲਈ ਜ਼ਮੀਨ ਤਿਆਰ ਕੀਤੀ ਜਾ ਰਹੀ ਹੈ। ਕਦੇ ਕਿਹਾ ਜਾ ਰਿਹੈ ਕਿ ਬਾਹਰੋਂ ਆਏ ਕੁਝ ਲੋਕ ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਕਾਮਿਆਂ ਨੂੰ ਭੜਕਾਅ ਰਹੇ ਹਨ। ਹੈ ਨੀ ਕਮਾਲ ਦੀ ਚਤੁਰਾਈ! ਆਪਣੇ ਮੁੜ੍ਹਕੇ ਦਾ ਮੁੱਲ ਮੰਗਣਾ, ਸੰਵਿਧਾਨਕ ਹੱਕਾਂ ਨੂੰ ਵੀ ਲਾਗੂ ਕਰਨ ਦੀ ਮੰਗ ਕਰਨਾ, ਦਹਿਸ਼ਤਗਰਦੀ ਹੈ ਜਦੋਂ ਕਿ ਕਾਮਿਆਂ ਦੇ ਹੱਕਾਂ ਉੱਪਰ ਝਪਟਾ ਮਾਰਨਾ ਸ਼ਾਂਤੀ ਦੇ ਪੁੰਜ ਹੋਣਾ ਅਤੇ ਸ਼ਰੀਫ਼ ਨਾਗਰਿਕ ਹੋਣਾ ਹੈ! ਹੁਣ ਇਸ ਦੰਭ ਦੇ ਲੰਗਾਰ ਵਗਾਹ ਮਾਰੇ ਹਨ। ਕਾਮਿਆਂ ਨੇ ਅੱਖ ਖੋਲ੍ਹੀ ਹੈ। ਆਪਣੇ-ਪਰਾਏ ਦੀ ਪਹਿਚਾਣ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਇਹ ਪਹਿਚਾਣ ਕਿਤੇ ਗੂਹੜੀ ਅਤੇ ਪੱਕੀ ਨਾ ਹੋ ਜਾਏ। ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਕਾਮਿਆਂ ਦੀ ਆਵਾਜ਼ ਸੰਗ ਆਵਾਜ਼ ਮਿਲਾਉਣ ਲਈ ਹੋਰ ਸਨਅਤੀ ਕਾਮੇ ਜੋਟੀਆਂ ਪਾ ਕੇ ਸੜਕਾਂ 'ਤੇ ਨਿੱਤਰ ਨਾ ਪੈਣ ਇਸ ਡਰੋਂ ਮਿੱਲ ਮਾਲਕਾਂ ਦੇ ਕਲੇਜੇ ਹੌਲ ਪੈ ਰਹੇ ਹਨ।

ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਕਾਮਿਆਂ ਉਪਰ ਇਸ ਮਜ਼ਦੂਰ ਵਿਰੋਧੀ ਅਤੇ ਲੋਕ-ਵਿਰੋਧੀ ਢਾਂਚੇ ਦੀ ਗੈਰ ਜਮਹੂਰੀ, ਗੈਰ-ਸੰਵਿਧਾਨਕ ਅਤੇ ਗੈਰ ਇਖਲਾਕੀ ਭਰੀ ਦਹਿਸ਼ਤਗਰਦੀ ਅਤੇ ਧੱਕੇ ਸ਼ਾਹੀ ਖਿਲਾਫ ਸਾਂਝੀ ਆਵਾਜ਼ ਬੁਲੰਦ ਕਰਨ ਲਈ ਅੱਜ 12 ਨਵੰਬਰ ਨੂੰ ਪੰਜਾਬੀ ਭਵਨ ਲੁਧਿਆਣਾ ਵਿਖੇ ਅਤੇ 13 ਨਵੰਬਰ ਨੂੰ ਪਿੰਡ ਭੈਣੀ ਬਾਘਾ (ਮਾਨਸਾ ਲਾਗੇ) ਅਪ੍ਰੇਸ਼ਨ ਗਰੀਨ ਹੰਟ ਵਿਰੋਧੀ ਜਮਹੂਰੀ ਫਰੰਟ, ਪੰਜਾਬ ਦੀ ਅਗਵਾਈ 'ਚ ਸਮੂਹ ਜਮਹੂਰੀ ਹਲਕੇ ਮਿਲ ਕੇ ਕਨਵੈਨਸ਼ਨਾਂ ਕਰ ਰਹੇ ਹਨ। ਇਸ ਸੁਲੱਖਣੇ ਵਰਤਾਰੇ ਨੂੰ ਹੁੰਗਾਰਾ ਭਰਨ ਲਈ ਹੋਰ ਮਿਹਨਤਕਸ਼ ਤਬਕੇ ਵੀ ਸਿਰ ਜੋੜ ਕੇ ਕਨਵੈਨਸ਼ਨਾਂ 'ਚ ਪੁੱਜ ਰਹੇ ਹਨ। ਟੈਕਸਟਾਈਲ ਕਾਮਿਆਂ ਉਪਰ ਦਬਾਅ ਪਾਉਣ, ਹੱਕ ਖੋਹਣ ਅਤੇ ਕੁੱਟਣ ਦੇ ਮੌਕੇ ਤਲਾਸ਼ਣ 'ਚ ਲੱਗੇ ਮਾਲਕਾਂ ਅਤੇ ਗੋਬਿੰਦਪੁਰਾ ਦੇ ਹੱਕੀ ਸੰਗਰਾਮ 'ਚ ਖ਼ਾਸ ਕਰਕੇ ਔਰਤਾਂ ਨੂੰ ਜ਼ੁਲਮ ਦਾ ਸ਼ਿਕਾਰ ਬਣਾਉਣ 'ਤੇ ਤੁਲੇ ਹਾਕਮਾਂ ਖਿਲਾਫ ਇਹ ਜਮਹੂਰੀ ਕਨਵੈਨਸ਼ਨਾਂ, ਅਪਰੇਸ਼ਨ ਗਰੀਨ ਹੰਟ ਦੇ ਮੁਲਕ-ਵਿਆਪੀ ਵਰਤਾਰੇ ਦੇ ਪ੍ਰਸੰਗ 'ਚ ਇਸ ਮਾਮਲੇ ਉਪਰ ਰੌਸ਼ਨੀ ਪਾ ਰਹੀ ਹੈ। ਇਹ ਕਾਰਪੋਰੇਸ਼ਨ ਉੱਘੇ ਰੰਗ ਕਰਮੀ ਜਤਿਨ ਮਰਾਂਡੀ ਨੂੰ ਫਾਂਸੀ ਦੀ ਸੁਣਾਈ ਸਜ਼ਾ ਅਤੇ ਸੋਨੀ ਸੋਰੀ ਉਪਰ ਮੜ੍ਹੇ ਝੂਠੇ ਕੇਸ ਵਾਪਸ ਕਰਾਉਣ ਲਈ ਆਵਾਜ਼ ਲਾਮਬੰਦ ਕਰਨ ਦੀ ਵੀ ਲਲਕਾਰ ਬਣੇਗੀ।